दैनिक ट्रिब्यून के सम्पादकीय में दो दोहों का उल्लेख

…देवता खामोश है !

Posted On July - 10 - 2011

तिरुवनंतपुरम स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर से एक लाख करोड़ रुपये का खजाना मिलने के समाचारों ने आम आदमी को चौंकाया। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी बनाई गई सात सदस्यीय समिति को बाकी तहखानों को खोलने से रोक दिया है जिनको लेकर आम जनमानस में भारी उत्सुकता बनी हुई थी। खंडपीठ ने याचिकाकर्ता त्रावणकोर के राजकुमार रहे राजा मार्तण्ड वर्मा के आग्रह पर ऐसा किया। राजघराने की इन्हें खोलने से होने वाले अनिष्ट की आशंका पर शीर्ष अदालत ने यह फैसला सुनाया है। वास्तव में आज इस मंदिर की पवित्रता व सुरक्षा को बनाये रखना पहली प्राथमिकता है। सुकूनभरी बात यह है कि खजाने पर राजपरिवार ने दावा नहीं जताया है। इस खजाने के मिलने से आम जनमानस को कई सवालों के जवाब मिले तो कई नये सवाल भी पैदा हुए हैं। पिछले दिनों एक स्वामीजी की अकूत संपत्ति मिलने की चर्चाओं पर विराम लगा भी नहीं था कि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर से एक लाख करोड़ का खजाना मिलने ने देश के अन्य शीर्ष सूची पर विराजमान समृद्ध धर्म-स्थलों को पीछे धकेल दिया। इन अकूत धन-संपदा वाले मंदिरों ने एक सवाल का जवाब तो दे दिया कि क्यों भारत को सोने की चिडिय़ा कहा जाता था। यह भी कि इस अकूत खजाने के प्रलोभन में तमाम विदेशी आक्रांताओं ने बार-बार भारत पर हमला करके मंदिरों में जमकर लूटपाट की। बहुचर्चित सोमनाथ मंदिर का उदाहरण हमारे सामने है, जहां मोहम्मद गजनवी ने सात बार आक्रमण किये। बहरहाल, ताजा प्रकरण में भी मीडिया ने जिस तरह खजाने की खबरों को सनसनी से परोसा है, उससे मंदिर की सुरक्षा को भारी खतरा पैदा हो गया है। खबरों को पढ़कर दुनियाभर के शातिर चोर सक्रिय हो गये हैं क्योंकि संपत्ति को लेकर अनावश्यक उत्सुकता बन रही है। पूरी दुनिया में चोरों द्वारा धार्मिक स्थलों को निशाना बनाये जाने की खबरें अकसर आती रहती हैं। जैसा कि कलियुगी आस्थाविहीन लोगों पर तंज़ करते हुए कवि रघुविन्द्र यादव लिखते भी हैं :-
मंदिर, मस्जिद, चर्च पर पहरा दे दरबान,
गुंडों से डरने लगे, कलियुग के भगवान।
ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठ सकता है कि सृष्टि के रचयिता व भक्तों को सर्वस्व देने वाले भगवान के मंदिर में इतने बड़े खजाने का क्या औचित्य है? क्या वाकई भगवान अपने धनाढ्य व साधन-संपन्न भक्तों के चढ़ावे से प्रसन्न होते हैं? यह हमारी मनोगं्रथि है कि लेनदेन से भगवान प्रसन्न होते हैं? कई धार्मिक व पौराणिक कथाओं में इस बात का स्पष्ट जिक्र मिलता है कि महज श्रद्धा व कदली फल व आटे के चूर्ण से की गई सच्ची प्रार्थना से भगवान ने विप्र ब्राह्मण व लकड़हारे के कई जन्म सुधार दिये। एक मेहनतकश आम आदमी के पास क्या इतना पैसा संभव है कि वह धार्मिक स्थलों में सोना-चांदी चढ़ा सके? यह निर्विवाद है कि बड़े बिजनेसमैन व शासक वर्ग की तरफ से धार्मिक स्थलों में मोटा चढ़ावा आता है। पहले यह राजाओं, जमींदारों व सत्ताशीर्ष से जुड़े व्यक्तियों की तरफ से आता था। सवाल यह भी है कि उनके पास यह पैसा कहां से आता है? पैसा तो आम आदमी से वसूला गया होता है। यह बात अलग है कि वसूलने का आधार जायज था या नाजायज? सवाल यह भी है कि क्या यह चढ़ावा श्रद्धा-भाव से चढ़ाया गया है? या फिर इसमें दिखावा या आडम्बर है? या फिर अपने उन कर्मों का पछतावा है जिसमें उन्होंने यह संपत्ति अर्जित की? ऐसे ही तमाम अनगिनत प्रश्न इससे जन्म लेते हैं। ऐसे में जमीनी हकीकत को बताते हुए कवि शायक लिखता है :-
बहुत देखे हैं मानव के बनाये झूठ के गुम्बद,

स्वयम् भगवान के हाथों रची सच्चाइयां देख।
वास्तव में धार्मिक जीवन में वक्त के साथ तमाम तरह की विद्रूपताएं जुड़ गईं। ईमानदारी से देखें तो आज धर्म देश का सबसे बड़ा कारोबार बन चुका है। धार्मिक आडम्बर ने आस्था की पवित्रता को दरकिनार कर दिया है। मंदिरों में मोटे चढ़ावे व सामान्य चढ़ावे की लगने वाली कतारें बताती हैं कि धर्म के ठेकेदार व्यक्ति की आस्था नहीं उसकी हैसियत से भक्त का मूल्यांकन करते हैं। संपन्न भक्तों को शार्टकर्ट से दर्शन व आम आदमी को घंटों की प्रतीक्षा कराना इसी कड़ी का हिस्सा है। ऐसे माहौल पर तंज़ करते हुए किशोर तिवारी कहते हैं :-
हर मसीहा अब दयारे-संग-सा खामोश है,
धर्म धंधा हो गया है, देवता खामोश है।
केरल के श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर के बारे में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों का स्वागत किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने मंदिर की पवित्रता व आस्था को अक्षुण्ण बनाये रखने के आदेश राज्य सरकार को दिये हैं। अदालत ने शाही खानदान से पूछा है कि मंदिर की क्या परंपराएं हैं और उन्हें कैसे अक्षुण्ण रखा जाये? यहां तक कि अदालत ने जनभावनाओं का सम्मान करते हुए परंपराओं को कानून के ऊपर तरजीह दी है। लेकिन इसी के साथ उसने राज्य की सरकार को चेताया है कि मंदिर परिसर से मिली संपत्ति का तमाशा न बनाया जाए। मीडिया में इस संपत्ति का जिस तरह से प्रचार किया जा रहा है उस पर चिंता जताते हुए अदालत ने कहा है कि इससे लोगों में भगवान को छोड़कर मंदिर में मिले हीरे-जवाहारात के प्रति ज्यादा उत्सुकता पैदा हो रही है जो चिंता की बात है। ऐसे में मंदिर व संपत्ति की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
लेकिन यहां एक नैसर्गिक प्रश्न भी उठता है कि देश के धार्मिक स्थलों में विद्यमान अथाह धन-संपदा का रक्षण कैसे किया जाए? कैसे इस धन को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए? सरकारी तंत्र पर तो जनता का भरोसा कम है, इसलिए न्यायालय द्वारा देश के तमाम धार्मिक स्थलों की बहुमूल्य संपदा के रखरखाव के लिए एक स्वायत्तशासी बोर्ड के गठन पर विचार किया जाना चाहिए। आज देश में धार्मिक स्थानों में जमापूंजी की बंदरबांट की खबरें अकसर सामने आती रही हैं। कुछ लोग जो धर्म को धंधा बनाकर अपने स्वार्थों को पूरा कर रहे हैं उन पर भी अंकुश लगाया जाना जरूरी है। ‘इसलिए जारी हैं उसके नाम पर मक्कारियां, सबको पक्का इल्म है परमात्मा खामोश है।' यह भी विचारणीय प्रश्न है कि जिस देश में अथाह गरीबी हो और धार्मिक स्थल धन-संपदा से ठसाठस भरे हों, वहां इसके मध्य संतुलन कैसे कायम हो? दरिद्रनारायण की सेवा के बारे में भी हमें सोचना होगा, मानव-सेवा से भी भगवान अवश्य प्रसन्न होते हैं। कहीं ऐसा न हो कि आर. यादव लिखने को फिर मजबूर हों :-
पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग,
मर जाते फुटपाथ पर, भूखे-प्यासे लोग।

दैनिक ट्रिब्यून के 10 जुलाई के अंक में सम्पादकीय में नागफनी के फूल से दो दोहों का उल्लेख किया गया है.

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