दैनिक ट्रिब्यून के सम्पादकीय में प्रकाशित दोहा

…इसी को मेरी उड़ान लिखना

Posted On May - 15 - 2011

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में आज नारी-शक्ति का परचम लहरा रहा है। हाल के विधानसभा चुनावों में ममता की आंधी और जय ललिता की जय-जयकार ने यह साबित भी किया। लेकिन इन बड़ी खबरों के बीच देश के अशांत इलाके जम्मू-कश्मीर से एक सुकूनभरी खबर आई। आतंकवाद से ग्रस्त बारामूला जनपद की वुस्सन ग्राम पंचायत के लिए हुए चुनाव में एक कश्मीरी पंडित परिवार की महिला आशा ने जीत का परचम लहराया। खबर इसलिए महत्वपूर्ण है कि उग्रवाद से ग्रस्त इस इलाके में कश्मीरी पंडित उंगलियों पर गिने जाते हैं और गांव मुस्लिम-बहुल है। ग्रामीणों के भारी दबाव के बाद आशा ने चुनाव लड़ा और जीता। इस घटना के निहितार्थ स्पष्ट हैं कि आम जनमानस संकीर्णताओं की बेडिय़ां तोडऩा चाहता है। इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि पड़ोस से बहने वाली ज़हरीली हवाओं ने कश्मीर की फिजाओं में ज़हर घोला अन्यथा आम आदमी तो सांप्रदायिक सौहार्द में विश्वास रखता है। तभी तो गिने-चुने कश्मीरी पंडित आतंकवादियों की तमाम धमकियों के बावजूद घाटी में जमे हैं, ये सब ग्रामीणों के संरक्षण से ही संभव है। उनकी मनोदशा को कवि विपिन के शब्दों में कुछ इस तरह बयां किया जा सकता है :-
हुआ हूं पिंजरे में बंद तो क्या, मेरा सफर तो रुका नहीं है,
मैं अपने पर फडफ़ड़ा रहा हूं इसी को मेरी उड़ान लिखना।
आशा पंडित की जीत के मायनों को समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि आम आदमी मु_ीभर आतंकियों के आतंक से मुक्त होना चाहता है। यह कदम उन आतंकियों के मुंह पर करारा तमाचा भी है जो घाटी को भारत से अलग करने की मुहिम चला रहे हैं। इससे यह भी संदेश सामने आया कि आम आदमी आतंक के कारोबार से आजिज आ चुका है। यदि सरकार की ओर से घाटी में शांति बहाली की ईमानदार कोशिश हो तो लोग आतंकवाद के खिलाफ खड़े हो सकते हैं। वास्तव में नौकरशाही के निकम्मेपन या राजनेताओं के अदूरदर्शी फैसले कश्मीर समस्या के मूल में हैं। अन्यथा कश्मीर के लोग तो बहादुरशाह जफर की इस बात पर अमल करना चाहते हैं :-
कांटे चुनते हुए चमन में रहूं,
ठोकरें खाकर भी वतन में रहूं।
इस घटनाक्रम को आतंक से जूझती घाटी में बदलाव की बयार के रूप में देखा जाना चाहिए। पहले तो आतंकवादी घाटी में पंचायत चुनाव होने देना ही नहीं चाहते थे लेकिन इसके बावजूद दशक में दूसरी बार संपन्न हुए शांतिपूर्वक चुनावों ने आतंकियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। फिर आशा की जीत ने कश्मीरी पंडितों के लिए उम्मीद जगाई है। आतंकवाद की मार झेलकर देश में ही शरणार्थियों का जीवन जीने को अभिशप्त कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए भी नये सिरे से माहौल बनाने की जरूरत है। आतंकी भले ही कुछ कहें आम कश्मीरी पंडितों का स्वागत करेगा, ऐसी उम्मीद तो जगी ही है। ऐसे कश्मीरी पंडितों के लिए यह संदेश अशोक अंजुम के शब्दों में दिया जा सकता है :-
वे जो विस्थापित हुए तज कश्मीरी घाट,
घाटी उनकी रात-दिन जोह रही है बाट।
वैसे आशा के परिजनों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने लगातार आतंकी हमलों के बावजूद कश्मीर घाटी नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी जन्मभूमि वुस्सन को छोडऩा स्वीकार नहीं किया। इसमें मुस्लिम बहुल ग्रामीणों की प्रशंसा करनी पड़ेगी जिन्होंने अल्पसंख्यक चार कश्मीरी पंडितों की रक्षा की। आशा के परिजन नहीं चाहते थे कि वह चुनाव लड़े। लेकिन गांव के ही अब्दुल हामिद ने आशा को चुनाव लडऩे को प्रेरित किया। ग्रामीणों के भरपूर सहयोग से ही आशा का चुनाव जीतना संभव हो पाया। ऐसे में सवाल उठना लाजि़मी है कि कश्मीर में आज भी तमाम अमन-पसंद लोग हैं तो आतंकवादियों के खतरनाक मंसूबे कैसे पूरे हो रहे हैं? आखिर केसर की क्यारियों में बारूदी गंध कैसे आई? घाटी से विस्फोटों के अनुबंध कैसे हुए? कुछ ऐसा ही सवाल कवि रघुविन्द्र भी करते हैं :-
गड़बड़ मौसम से हुई या माली से भूल,
आंगन में उगने लगे नागफनी के फूल।
अब लंबा अरसा हो चला है कि कश्मीर उदास है। कश्मीरियों ने आतंकवाद की बड़ी कीमत चुकाई है। आज उनके घावों पर मरहम लगाने की जरूरत है। कश्मीर की वादियों में पहले जैसी रौनक लौटै, हाउसबोट खचाखच भरे रहें और कश्मीर के स्थानीय लोगों को पर्यटन उद्योग से भरपूर रोजगार मिले। आज घायल कश्मीर के गुमराह हुए बेटों को मुख्यधारा से जोडऩे की जरूरत है। सड़कों पर पत्थरबाजी करते नौजवानों के हाथों को सम्मानजनक काम मिले तो फिर वे क्यों सड़कों पर उतरेंगे? यदि घाटी में सब कुछ ठीक-ठाक हो जाए तो फिर हम अमीर कजलबाश की इन पंक्तियों को सार्थक होते देख सकेंगे :-
बस्ती में सब खैर से हैं
यह अखबार पुराना है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि देर-सवेर घाटी का जनजीवन पटरी पर लौटेगा। आशा की जीत घाटी में नई उम्मीद जगाती है। हुर्रियत कांफे्रंस का चरमपंथी धड़ा भी कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए अपील कर रहा है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि देर-सवेर हालात बदलेंगे। बदलाव की बयार कश्मीरियों व विस्थापित पंडितों के जख्मों पर मरहम लगा सके तो इससे अच्छी बात क्या होगी? तब पड़ोसी के नापाक मंसूबे धरे रह जाएंगे, जैसा कि राजकुमार सयान लिखते हैं :-
सीमाओं को ताकते, पाक बने शैतान,
नापाकों की दृष्टि को, लगे ग्रहण सच आन।

http://dainiktribuneonline.com/2011/05/%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%89%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%BE/

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