अध्यापक बनने और होने के बीच - मधुकांत

जामगढ़/5 सितम्बर, 2005
आदरणीय गुरुजी,
प्रणाम! मैं आपका शिष्य राधारमण उर्फ राधे हूँ। शायद आपने मुझे विस्मृत भी कर दिया होगा। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि एक अध्यापक के जीवन में तो हजारों शिष्य आते हैं, चले जाते हैं, परन्तु शिष्यों के हृदय पटल पर अपने गुरुओं की तस्वीर इतने गहरे से अंकित होती है कि जीवन पर्यन्त उनकी स्मृति बनी रहती है। अध्यापक तो मेरे जीवन में सैंकड़ों आये। कुछ हल्की, कुछ गहरी, कुछ पीड़ादायक, कुछ सुखद स्मृतियाँ सबकी संजोयी हुई हैं। उन सब अध्यापकों के बीच गुरु जी तो केवल आप बने। कभी-कभी हम सहपाठी मिलते हैं तो आपका जिक्र श्रद्धापूर्वक करते हैं जबकि अन्य शिक्षकों पर उपहास भी करते हैं।
सबसे पहले तो मैं आपको अपनी पहचान कराने का प्रयत्न करता हूँ। वर्ष दो हजार में मैंने आपके विद्यालय से बारहवीं कक्षा पास की थी। मैं मेधावी छात्र तो नहीं था, परन्तु प्रारम्भ के आठ-दस छात्रों में मेरा नाम रहता था। मेरा रंग काला था इसलिए आप मुझे राधारमण न कहकर साँवरिया कहा करते थे। भगवान ने मुझे सुरीला कंठ दिया है इसलिए प्रत्येक शनिवार की बाल सभा में आप मुझसे गांधी जी का प्रिय भजन सुनते थे, वैष्णव जन...।
गुरुजी, मैं आपको पत्र के माध्यम से एक शुभ समाचार दे रहा हूँ कि मैं एक गाँव के सरकारी स्कूल में नियुक्त हो गया हूँ। अध्यापक होने के लिए मुझे आपके अनेक अनुभव याद हैं और भविष्य में भी आपसे मार्गदर्शन लेता रहूँगा।
शनिवार को बाल सभा में एक दिन आपने सभी बच्चों से पूछा था कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं? मेरा नम्बर आया तो मैंने झट से कह दिया था-'गुरुजी, मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनना चाहता हूँ।Ó उन दिनों वहाँ डॉक्टर को बहुत सम्मान मिलता था। इन्हीं सपनों के साथ मैंने विज्ञान की पढ़ाई भी आरम्भ की परन्तु आज मैं अनुभव करता हूँ कि भगवान ने मुझे इतनी तीव्र बुद्धि नहीं दी इसलिए विज्ञान को बीच में छोडक़र मैं केवल बी.ए. कर पाया। जब कोई दूसरा अच्छा विकल्प न मिला तो बी.एड. करके अध्यापक बनना ही सम्मानजनक लगा और वह मंजिल मैंने पा ली। मैं तो अध्यापक बन गया गुरुजी, परन्तु आप तो बड़े कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। मैं यह तो नहीं जानता कि आपका अध्यापक बनने में क्या उद्देश्य रहा होगा। जो भी हो गुरुजी, मैं अब एक अच्छा अध्यापक बनना चाहता हूँ, कृपया इसके लिए मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करें।
अनेक बार सुना और पढ़ा भी है कि गुरु संसार का सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति है। वह सच्चा ज्ञान देकर भगवान से मिला सकता है। न जाने मेरा भ्रम है या यथार्थ आज तक मुझे तो अपने विद्यालय में और आस-पास ऐसा गुरु दिखाई नहीं दिया। फिर वह किस गुरु के विषय में लिखा है? मेरी तो समझ में नहीं आता कि वह गुरु कैसे बना जा सकता है?
'जो कुछ कर नहीं सकता वह अध्यापक बनता है।' मुझे तो इस बात में कोई दम नहीं दिखाई देता क्योंकि अध्यापक बनना इतना आसान नहीं है कि जो चाहे वही बन जाये। सच मानना गुरुजी अध्यापक बनने की प्रक्रिया में मेरा शरीर छिल-छिल कर लहुलुहान हो गया है। अध्यापक बनने के लिए लोग दोनों जेबें भरे घूमते रहते हैं। मेरे पिताजी भी यही कहते थे-''बेटे शुरू में आधे किले की मार है फिर सारी उम्र मौज करेगा।" न तो उस दिन और न आज तक मैं उस 'मौज' का अर्थ समझ पाया। यह तो सच है अध्यापक कुछ न करे तो कोई पूछता नहीं, परन्तु कर्र्मठ अध्यापक का काम कभी पूरा नहीं हो सकता। बल्कि करने वाले को अधिक काम दिया जाता है और वही उसकी प्रतिष्ठा है।
आज दुनिया में सब विद्वान हैं सब दूसरे को उपदेश देना चाहते हैं कोई दूसरे की बात सुनना ही नहीं चाहता। यह तो अबोध विद्यार्थी हैं जो हमारी सारी अच्छी-बुरी बातों को सुनते रहते हैं और बिना किसी विरोध के स्वीकारते रहते हैं। एक और बड़ा परिवर्तन आया है आजकल के विद्यार्थी हमें सर जी, मैडम जी कहकर संबोधित करते हैं गुरुजी शब्द में जो आदर व निष्ठा थी वह इस हिन्दी-अंग्रेजी के मिले-जुले शब्दों में कहाँ? मैंने बदलाव करने का सोचा था, परन्तु मुख्याध्यापक ने समझाया-'राधारमण सारी दुनिया अंग्रेजी के पीछे दौड़ रही है। अच्छे परिवारों के सब बच्चे प्राइवेट स्कूलों में चले जाते हैं। सरकार भी प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले में अपने स्कूलों में कुछ सुधार करना चाहती है। इसीलिए मेरा सुझाव है, इस परिवर्तन को रहने दो।Ó गुरुजी मैं भी क्या बक-बक लेकर बैठ गया। ये सब पढक़र आप मुझ पर हँसेंगे। परन्तु मैं भी क्या करता बहुत दिनों से आपके सामने बातें करने का मन हो रहा था, आज पत्र लिख कर मन संतुष्ट हो गया। यदि आपको कष्ट न हो तो आशीर्वाद स्वरूप कुछ पंक्तियाँ मेरे लिए अवश्य लिख भेजियेगा।
आपका
राधारमण 'साँवरिया'
सांकला, 2 अक्टूबर 2005
प्रिय राधारमण,
खुश रहो। तुम्हारा पत्र मिला। समझ में नहीं आया मुझे पत्र लिखने का तुम्हारा क्या प्रयोजन रहा है। वैसे तो मै तुम्हें पहचानने में असफल रहता परन्तु गाँधी जी के भजन ने तुम्हारी स्मृति को ताजा कर दिया। तुम्हारे कण्ठ की आवाज सुनकर उन दिनों मैं सोचता था कि तुम एक अच्छे गायक बनोगे परन्तु बहुत कठिन है कि आदमी का शौक और व्यवसाय एक हो जाये। खैर वक़्त ने तुम्हें अध्यापक बना दिया, परन्तु प्रिय राधारमण अब केवल अध्यापक नहीं एक शिक्षक बन कर दिखाना।
तुमने मेरे शिक्षक बनने की प्रक्रिया की चर्चा की। यह पूर्णतया सच है कि मेरे घोर व्यवसायी घराने में कोई अध्यापक बनने की कल्पना भी नहीं कर सकता। पारिवारिक परम्परा के अनुसार व्यवसाय करना, धन कमाना, धनवान होने की प्रतिष्ठा अर्जित करना मेरे लिए सरल ही था और अनुकूल भी। परन्तु मुझे लगा था कि प्रभु ने मुझे लिखने के लिए भेजा है। लेखन और अध्ययन दोनों कार्य अध्यापक के अनुकूल बैठते हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षण को मैं श्रेष्ठ कार्य मानता हूँ। सुबह-सुबह निश्चित समय पर विद्यालय में प्रवेश। छात्रों-अध्यापकों का आपसी अभिवादन, फिर नन्हे-मुन्ने बच्चों के साथ सामूहिक प्रार्थना। दिन-भर ज्ञान-विज्ञान की चर्चा, अध्यापकों द्वारा नैतिक, श्रेष्ठ नागरिक बनने पर बल। शरीर को हष्ट-पुष्ट बनाने के लिए क्रीड़ा-अभ्यास, छात्रों में निहित नाना प्रकार की प्रतिभाओं का विकास- दुनिया में इससे अच्छा काम क्या हो सकता है?
आज भी समाज में अध्यापक का चाहे जो स्थान हो, परन्तु अन्य व्यवसाय का नौकरी से वह अधिक ईमानदार और विश्वसनीय है। स्कूल में उपस्थित अध्यापक सच बोलने की बात सिखाता है या चुप रहता है, परन्तु झूठ बोलने की प्रेरणा कभी नहीं देता।
प्रिय राधारमण, शिक्षक बनना तो आसान है, परन्तु शिक्षक होना मुश्किल है। समाज अध्यापक को एक विशिष्ट प्राणी मानता है और यह सच भी है, क्योंकि छात्रों के लिए अध्यापक अनुकरणीय होता है। इसलिए अनेक बार अध्यापक को अपने मन के विपरीत वह करना पड़ता है जो समाज के लिए श्रेष्ठ हो।
तुम नये-नये अध्यापक बने हो। तुम्हारे सम्मुख अनेक प्रकार के अध्यापक आयेंगे, परन्तु तुमको एक विशिष्ट कर्म योगी अध्यापक बनना है ताकि दूसरे तुमसे प्रेरणा लें। अधिक से अधिक समय अपने शिष्यों के साथ रहना है। भययुक्त अनुशासन नहीं बनाना भयमुक्त शिक्षण करना है। प्रत्येक छात्र में एक विशिष्ट प्रतिभा है। तुम्हें उसको दिशा बोध कराना है। उसकी जिज्ञासाओं को खुशी-खुशी शांत करना है, सभी शिष्यों को अपनी औलाद के समान मानना है। सच कहता हूँ तुम्हें इतनी खुशी व संतोष मिलेगा कि दुनिया का कोई भी सुख उतना आनंद नहीं दे पाएगा।
जानते हो भरे बाजार में गुजरते हुए जब एक सेठ-नुमा शिष्य ने दुकान से निकलकर सबके सामने मेरे पाँव छुए तो मुझे बहुत खुशी हुई थी। मन हुआ था कि चिल्लाकर सबके सामने कहूँ-'दुनिया वालो देखो, किसी भी व्यवसाय या नौकरी में इतना गौरव और सम्मान है जो आज मुझे अध्यापक बनने पर मिला है।Ó अध्यापक दृढ़ संकल्प करके अपने मन में ठान ले तो कुछ भी बदल सकता है। अपने शिष्यों को बदलना तो बहुत आसान है, क्योंकि वे तो कच्ची मिट्टी के बने हैं, परन्तु अध्यापक तो उनके माँ-बाप को भी बदल सकता है। क्योंकि अभिभावकों की चाबी (बच्चे) उसके हाथ में है। मालूम नहीं तुम्हें याद है कि नहीं जब मैं 1998 में इस विद्यालय में आया था तो कई अध्यापक व बहुत सारे छात्र धुम्रपान करते थे। विद्यालय में एक माह तक संस्कार उत्सव चलाया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य धुम्रपान रोकना था। जब मैंने बच्चों के माध्यम से यह बात उनके घरों में भेजी कि जिनके परिवार में एक व्यक्ति भी धुम्रपान करता है तो परिवार के नन्हे-मुन्ने बच्चों को भी न चाहते हुए धुम्रपान करना पड़ता है। उनके अभिभावक ही उनके नाजुक फेफड़ों को खराब कर रहे हैं। परिणाम जानने के लिए संस्कार उत्सव समापन पर अभिभावकों की प्रतिक्रिया जानी, तो आश्चर्यजनक परिणाम सामने आये। बच्चों ने जिद्द करके, प्रार्थना करके अपने घर में धुम्रपान बंद करवा दिया। स्कूल में धुँआ उड़ाना वैसे ही बंद हो गया। ऐसी अपूर्व शक्ति संजोए हैं अध्यापक।
प्रिय राधारमण, मैं इसलिए अध्यापक बना कि साहित्य साधना के लिए पर्याप्त समय और उपयुक्त वातावरण मिल जाएगा, परन्तु अध्यापक बनने के बाद मैंने समझा कि अध्यापक के पास तो समय का बड़ा अभाव है। वह कितना भी कार्य करे वह पूरा हो ही नहीं सकता। साहित्य सृजन के लिए अन्दर की कुलबुलाहट जो हिलोर मारकर कागज पर उतारना चाहती थी, वह छात्रों के साथ अभिव्यक्त होकर शांत हो जाती। इसलिए अध्यापक बनकर खूब लिखने का जो विचार था उसके लिए न मन ही तैयार होता और न समय ही मिलता। अब तुम केवल शिष्य नहीं हो, मेरे अनुरूप, एक शिक्षक का, राष्ट्र निर्माता का कार्यभार तुम्हारे कँधे पर आ गया है। मेरा सम्पूर्ण सहयोग और आशीर्वाद तुम्हारे लिए है।
बहुत-बहुत शुभकामनाओं के साथ।
तुम्हारा
विद्या भूषण
जामगढ़ 5 सितम्बर, 2010
आदरणीय गुरुजी,
प्रणाम। लगभग पाँच वर्ष पूर्व आपका पत्र मिला था। वह पत्र नहीं मेरे लिए गीता-अमृत था। जब कभी मन कुंठित व व्यथित होता तो आपके पत्र को निकाल कर पढ़ लेता था। सच मानना पत्र पढक़र मेरा मन खुशी व उत्साह से भर जाता और मुझे सही दिशा का बोध करा देता। आपने इतना जीवंत व पे्ररणादायक पत्र लिखकर मुझ जैसे पूर्व शिष्य पर जो अनुकम्पा की है वह केवल मेरे लिए नहीं, सभी शिष्यों के लिए आशीर्वाददायक रहेगी। अध्यापक बनने के बाद पिछले पाँच वर्षों में मैंने एक शिक्षक के कार्य को करीब से देखा है। शिक्षण कार्य पहले से दुरुह हो गया है। कक्षाओं में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसको देखने के लिए शिष्य आए, वहाँ सुनने के लिए कुछ भी नवीन व रोचक नहीं है जो छात्र के कानों को आकर्षित करे, वहाँ करने को कुछ नहीं है जो फलदायक या प्रेरणादायक हो। प्रारम्भ में लगभग आधे छात्र स्कूल में प्रवेश करते थे। जो आते वो भी एक दो घण्टी इधर-उधर घूमकर चले जाते। अद्र्धावकाश के समय पूर्णावकाश जैसा वातावरण बन जाता।
छात्रों को जोडऩे के लिए मैंने अभिभावकों के साथ सम्पर्क किया। यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि आस-पास से आने वाले गाँवों के कुछ बच्चों का निरन्तर अनुपस्थित रहने से स्कूल से निष्कासन हो गया है, परन्तु वे अपने अभिभावकों से प्रतिदिन झूठ बोलकर पढ़ाई के लिए खर्च ले आते और सारा दिन बाजार, स्टेशन, सिनेमाघर में घूमकर घर लौट जाते। जब अभिभावकों को यह पता लगा कि स्कूल में उनका नामांकन भी नहीं तो उन्होंने दाँतों तले उँगली दबा ली।
कुछ अभिभावकों को सजग करके, छात्रों को समझाकर, खेलों के माध्यम से बच्चों को स्कूल से जोड़ा गया। नियमित प्रार्थना होने लगी। स्कूल में फूल-पौधे लगाये गये। स्कूल-भवन में पहली बार सफेदी हुई, लैब और पुस्तकालय की धूल झाड़ी गई। जहाँ गाली-गलौच व फिल्मी गानों का चलन था वहाँ भजन, प्रार्थना होने लगी। धीरे-धीरे वह भवन स्कूल का रूप लेने लगा। इस प्रक्रिया में कई अवसर ऐसे भी आए जब छात्रों, अभिभावकों, अधिकारियों व अध्यापकों के कारण मन कुंठित व कलांत हुआ। उन जैसा बन जाने का भी मन हुआ परन्तु आपकी प्रेरणा व आशीर्वाद ने मुझे बचा लिया।
शहरों से फैलता हुआ अब ट्यूशन का जाल कस्बों और गाँवों तक फैल गया है। इस विद्यालय के विज्ञान और गणित अध्यापक खूब ट्यूशन करते हैं। स्कूल से अधिक परिश्रम वे घर की कक्षाओं में करते हैं। अंग्रेजी का अध्यापक होने के नाते आरम्भ में कुछ विद्यार्थी मेरे पास भी ट्यूशन रखने आये थे। मैंने तो स्पष्ट कह दिया-स्कूल में मुझ से कुछ भी समझ लो, घर पर समझो आ जाओ, परन्तु ट्यूशन के रूप में नहीं। गुरु जी आपने ही बताया था कि ट्यूशन करने वाले अच्छे से अच्छे अध्यापक में भी कमजोरी आ जाती है। आपका अनुकरण करते हुए मैंने भी ट्यूशन न करने का संकल्प किया हुआ है। जो अध्यापक ट्यूशन नहीं करते, वे दूसरे पार्ट टाइम काम करते हैं। सामाजिक ज्ञान का अध्यापक प्रोपर्टी डीलर का काम करता है। बहुत कम स्कूल आता है और जब आ जाता है तो उसके कान पर फोन लगा रहता है। ड्राइंग मास्टर की स्टेशनरी की दुकान है, सुबह उसकी पत्नी और शाम को वह खुद दुकान पर बैठते हैं। संस्कृत शिक्षक, शास्त्री जी, विवाह-महूर्त, जन्म-पत्री, ज्योतिष आदि अनेक कामों में लगे रहते हैं। पी.टी.आई. दिन-रात अपने खेतों तथा पशुओं की देखभाल करने की योजना बनाता रहता है। सांय को दूध बेचता है और स्कूल में बैठकर सबका हिसाब जोड़ता है। संक्षेप में कहूँ तो पूरा स्कूल एक डिपार्टमैंटल सर्विसिज एजेन्सी-सा लगता है।
आपने ठीक लिखा है कि अध्यापक के शब्दों में बहुत ताकत होती है। दृढ़ इच्छा से कुछ भी कराया जा सकता है। मैंने कई छात्रों पर इसका प्रयोग किया। आपकी दया से सफलता मिली। उत्साह भी बढ़ा और अधिकारियों में साख बढ़ी। प्रत्येक मास जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में होने वाली मासिक बैठक में मुझे शैक्षिक सलाहकार के रूप में बुलाया जाने लगा है।
गुरु जी एक बात मैं सच्चे मन से आपके सामने रखना चाहता हूँ। जब मै छात्र था तो सोचता था गुरु जी सदैव बच्चों के पीछे पड़े रहते हैं। क्यों प्रतिदिन स्कूल आ धमकते हैं? कोई नेता क्यों नहीं मरता की स्कूल की छुट्टी हो जाए? क्यों बार-बार परीक्षा का आतंक दिखाया जाता है? परन्तु आज ये सब बातें बेमानी लगती हैं। कैसी नादानी थी उन दिनों। आज अध्यापक बनने के बाद साफ-साफ समझ में आ रहा है। छात्रों को श्रेष्ठ बनाने के लिए अध्यापक को कुछ तो अंकुश लगाना ही पड़ता है। कच्चे घड़े की मानिंद एक ओर से हाथ का सहारा देकर पीटना पड़ता है। तभी तो घड़े का सुन्दर व उपयोगी रूप बनकर निकलता है।
विद्यार्थियों के साथ खेलना मैंने आपसे सीखा था। आपके साथ इस सुखद समाचार को भी बाँटना चाहता हँू कि इस वर्ष हमारे विद्यालय की फुटबाल टीम ने जिला स्तरीय खेलों में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। हमारी टीम के पाँच छात्रों का चयन स्टेट में खेलने के लिए हुआ है। इन्हीं सफलताओं के कारण छात्र व अभिभावक मेरा बहुत सम्मान करते हैं। दूध, दही, लस्सी, अनाज, गुड़ न जाने क्या-क्या मेरे मना करने के बाद भी चुपचाप मेरे घर में रख जाते हैं। आपने सच लिखा था गुरुजी, यह सब मान-सम्मान और आनंद किसी और व्यवसाय में कहा..?
गुरु जी, ये सच है, मैं जार्ज बर्नाद शॉ के अनुसार जब कुछ न बन सका तो शिक्षक बन गया, परन्तु आप निश्चय रखा मैं अध्यापक बन तो गया, अब अध्यापक होकर भी दिखाऊँगा।
अपना आशीर्वाद यथावत बनाए रखना।
आपका शिष्य
राधारमण
सांकला, 2 अक्टूबर, 2010
प्रिय राधारमण,
उद्र्धोभव:। तुम्हारा दूसरा पत्र पढक़र मुझे जो खुशी और संतोष हुआ वह ऐसा ही था जो एक दीपक द्वारा दूसरे दीपक को प्रज्वलित करके होता है। माता-पिता और गुरु संसार में ऐसे प्राणी हैं जो अपने अनुज को अपने से भी बड़ा देखकर गर्व अनुभव करते हैं, क्योंकि उसमें उनका शारीरिक और वैचारिक अंश होता है।
आधुनिक युग में धन-लोलुपता को त्याग कर तुम ट्यूशन से अलग रहे हो तो मैं तुम्हें अपने से अधिक श्रेष्ठ बनाता हूँ। क्योंकि जिन दिनों मैंने ट्यूशन से बचने का फैसला किया था उन दिनों यह कार्य अधिक दुरुह नहीं था। परन्तु आज के भौतिक युग में यह बहुत कठिन कार्य है।
ऐसा नहीं है कि पूरा शिक्षक समाज आलसी, भ्रष्ट और गैर-जिम्मेदार है। यदि ऐसा होता तो शिष्यों का शिक्षकों से विश्वास उठ चुका होता। यूँ कहीं-कहीं ऐसा समाचार भी आ जाता है जो गुरु के सम्मान और प्रतिष्ठा पर प्रश्र चिह्न खड़ा कर देता है, परन्तु उन अध्यापकों की चर्चा नहीं होती जो चुपचाप मनोयोगपूर्वक अपने शिष्यों के सर्वांगीण विकास में लगे रहते हैं।
सांय के समय मैं दो घंटे बच्चों के साथ फुटबाल खेलता हूँ। बच्चों को तो लाभ होता ही है, परन्तु इससे मुझे जो स्वास्थ्य लाभ मिलता है उसी का परिणाम है कि पचास साल पार कर जाने के बाद भी लोग मुझे 35-40 का समझते हैं। यह क्या कम उपलब्धि है कि पचास साल बीत जाने के बाद भी मैंने आज तक किसी भी प्रकार की दवा का सेवन नहीं किया है। किसी अयोग्य छात्र को योग्य बनाने के लिए प्रेरित करना, उस पर उसका प्रभाव दिखाई देना सचमुच कितना संतोष और सुख प्रदान करता है इसका मैं आजकल अनुभव करने लग गया हूँ। पूरा दिन, सप्ताह, माह और एक वर्ष कब बीत जाता है पता ही नहीं चतला। पुराने छात्र जाने के बाद नये छात्र, नये अनुभव, नया संघर्ष, सब कुछ कितना मजेदार होता है, बताया नहीं जा सकता। आज के युग में रोजी-रोटी कमा लेना कोई मुश्किल कार्य नहीं है। रोजी-रोटी से पेट तो भर जाता है लेकिन एक मन की भूख होती है, ज्ञान की पिपाषा होती है, उसी को शांत करने के लिए एक शिष्य अपने गुरु के पास आता है। उन दोनों के बीच जब सही संवाद होता है तब शिक्षण का विकास होता है। यही निरन्तर संवाद ही अध्यापक को श्रेष्ठता प्रदान करता है।
एक अच्छा अध्यापक कभी नहीं मरता। वह अपने शिष्यों के विचारों में सदैव परिलक्षित होता रहता है। छात्र एक आइना होता है। तुम्हारे खतों को पढक़र आज मुझे अपने गुरु जी की याद आ गयी। उनका बहुत प्रभाव है मुझ पर। काश वो इस दुनिया में होते तो मैं उन्हें $खत लिखता।
राधारमण, मैं तुम्हें क्या बताऊँ अध्यापक तो एक राजा के समान होता है। राजा कंस ने अपने पिता को कारागार में डालने से पूर्व उनकी इच्छा जाननी चाही तो महाराज उग्रसेन ने समय व्यतीत करने के लिए कुछ शिष्यों को पढ़ाने की इच्छा व्यक्त की थी, तब दुष्ट कंस ने कहा था अभी तक सम्राट बनने की बू आपमें से गई नहीं। हमारे धर्म-शास्त्र इस बात के गवाह हैं कि राजा ने सदैव अपने गुरुओं को अपने से श्रेष्ठ और सम्मानित समझा है तभी तो अरस्तु ने सिकन्दर से कहा कि भारत से मेरे लिए एक गुरु लेकर आना। यही सच्चे गुरु की प्रतिष्ठा है और इसी प्रतिष्ठा को हमें बनायेे रखना है।
तुम्हारा
विद्याभूषण
राधारमण को इतना लम्बा पत्र लिखकर विद्याभूषण ने लिफाफे में बंद कर दिया। इत्मिनान से उसको एक तरफ रख पढऩे के लिए अखबार उठाया तो प्रथम पृष्ठ पर राज्य पुरस्कार के लिए श्रेष्ठ अध्यापकों की लिस्ट छपी हुई थी। लिस्ट में पहला ही नाम राधारमण का था। विद्याभूषण ने खड़े होकर पेपर उछाल दिया और आत्म-विभोर होकर नाचने लगे। एक क्षण ऐसा लगा की यह पुरस्कार उनके लिए ही घोषित हुआ है। वे राधारमण को हार्दिक बधाई देने के लिए सावधानीपूर्वक लिफाफे में पड़े खत को खोलने लगे।

-मधुकांंत

211 -एल, मॉडल टाऊन, डबल पार्क, रोहतक

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