पतझड़ में मधुमास की तरह



लघुकथाकारों में कृष्णलता यादव एक चिरपरिचित नाम है और इसकी साक्षी हैं उनके द्वारा लिखी गई अनगिनत लघुकथाएं। हालिया प्रकाशित चौथा लघुकथा-संग्रह ‘पतझड़ में मधुमास’ में संकलित लघुकथाओं में आम जीवन से जुड़ा लगभग हर पक्ष अपनी विसंगतियों के साथ-साथ आशा व सकारात्मकता के साथ उपस्थित है। लेखिका में क्षणों को पकड़कर उसकी समीक्षा करनेवाली संवेदनशीलता है जो इन लघुकथाओं में स्पष्ट रूप से उभरती दिखती है। आधुनिकता ने हमारे जीवन और इसकी पद्धति को कहां तक प्रभावित कर डाला है, उसके सशक्त उदाहरण मिलते हैं, ‘पैकेज’, ‘हाइटेक’, ‘ग्लोबलाइजेशन’, ‘घेरे अपने-अपने’ और ‘ममता’ प्रभृति लघुकथाओं में। उदाहरण के लिए ‘आधुनिकता का रंग’ को ले सकते हैं जिसमें शराब पीकर सड़क पर बेसुध पड़े बेटे के बारे में जब हेड कांस्टेबल उसके पिता को फोन पर सूचित करता है तो पिता प्रत्युत्तर में कहता है—‘अजी साहब, यही उम्र है लाइफ को इंज्वाय करने की।’
बच्चों के प्रति संवेदनशीलता के साथ-साथ कृष्णलता महिलाओं और बुजुर्गों की मनःस्थिति पर सूक्ष्म पकड़ रखती हैं। ‘नेह का बंधन’, ‘सयानपत’, ‘बहिष्कार’, ‘समय का दस्तूर’, ‘सोच’, ‘कुशंका’, ‘यही सच है’, ‘अनमोल खजाना’, ‘कथनी’, ‘अमृतकण’, विश्वास-अविश्वास’, ‘पर-उपदेश’, ‘बुढ़ापे की लाज’ सरीखी लघुकथाएं वयोवृद्धों के मन का विभिन्न कोणों से पड़ताल करती हैं। ‘सोच’ की अंतिम पंक्तियां—‘बहन, तुम-सी भाग्यशाली कोई नहीं। तुम जी-जान से नब्बेसाला सास की सेवा करके, घर बैठी पुण्य कमा रही हो। क्या इससे बड़ा कोई तीर्थ हो सकता है?’ महिला की स्वस्थ चिंतनधारा को इंगित करती हैं। वहीं दूसरी ओर ‘कड़वा सच’ नारी-मन की एक स्वार्थपरक छवि को केंद्रित करने में सार्थक रही है। इसी तरह ‘आक्रोश‘ में शोषण के विरुद्ध महिलाओं का संगठन एक आदर्श विद्रोह के रूप में परिलक्षित हुआ है। समाज और परिवार से जुड़े प्रसंग संग्रह की संस्कारगत विशिष्टताएं हैं। बेटी-बेटे का फर्क की मानसिकता ‘कामकाजी का जन्म’, ‘बेटे का धन’ आदि में बखूबी हुआ है। संग्रह की कुछेक लघुकथाओं के थीम पर पहले भी कई लघुकथाएं लिखी जा चुकी हैं। उदाहरणार्थ ‘दिल के अरमां’ और ‘अपनी अपनी मदिरा’ थीम पर वरिष्ठ लघुकथाकार उम्दा लघुकथाएं दे चुके हैं। उनसे तुलना कर अपनी लेखनी क्षमता का लघुकथाकार स्वयं भलीभांति मूल्यांकन कर सकती हैं। बहरहाल लघुकथाओं में सपाटबयानी से बचने का जितना भी प्रयत्न किया जाएगा, रचना उतनी ही सार्थक व परिपक्व बनकर उभरेगी। एक ही थीम पर कुछ अलग-सी लिखी गई लघुकथा का असर कहीं अधिक होता है। और सब कुछ कहने के बजाय लघुकथा स्वयं कहे तो उसकी संप्रेषण-क्षमता कुछ अधिक बढ़ जाती है। संक्षेप में कहा जाय तो कृष्णलता की ये लघुकथाएं सचमुच पतझड़ में मधुमास की ही तरह हैं जो आश्वस्त करती हैं।

-रतन चंद ‘रत्नेश’

0पुस्तक : पतझड़ में मधुमास 
0लेखिका : कृष्णलता यादव 
0प्रकाशक : अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
0पृष्ठ संख्या : 90 0मूल्य : रुपये 220.
देनिक ट्रिब्यून से साभार

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