विद्रूपताओं को बेपर्दा करता गीतिका संग्रह : कौन सुने इकतारा

भद्रजनों को संबोधित कर पद्य में बात कहने की परम्परा काफी पुरानी है। कबीर साहब जहाँ 'साधो' संबोधन का प्रयोग करते थे, वहीं उर्दू-फारसी के रचनाकार 'शैख जी' को संबोधित कर अपनी बात कहते रहे हैं। श्री रमेश जोशी का सद्य प्रकाशित गीतिका संग्रह 'कौन सुने इकतारा' इसी शैली की रचनाओं का संग्रह है, जिसे डॉ.रणजीत ने कबीर की चौथी विधा बताया है। जोशी जी ने अपनी बात 'भगत जी' और 'भगतो' संबोधनों का प्रयोग करते हुए गीतिका में कही है। जोशी जी ने कबीर की शैली को ही आत्मसात नहीं किया है वरन् उनकी रचनाओं की धार और मार भी कबीर जैसी ही है-
सुने न कोई हाल भगत जी
भूलो दर्द मलाल भगत जी
राजा बहरा जनता गूँगी
पूछे कौन सवाल भगत जी
भूख मज़ूरी मौज़ दलाली
बुरा देश का हाल भगत जी
अब घडिय़ालों के कब्ज़े में
है बस्ती का ताल भगत जी
कवि ने राजनीति, समाज, मंच, मीडिया, पर्यावरण, शिक्षा, नारी, पश्चिम के अंधानुकरण, भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता, जीवन की विसंगतियों, मूल्यहीनता, गाँवों की बदहाली आदि जीवन और जगत से जुड़े अनेक विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है। आलोच्य कृति में कुल 105 गीतिकाएँ शामिल की गई हैं।
जोशी जी का संवेदना-संसार व्यापक है और सहज-सरल भाषा में अपनी बात कहने में निपुणता हासिल है। कवि सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण से आहत है, उसे लगता है कि अब 'मंच मीडिया और सत्ता सभी पर लम्पट भाँड और नचनिया काबिज़ हो गए हैं', 'उपभोक्ता को ललचाने के लिए मॉडल वस्त्र उतार रही हैं', 'संयम गायब है और सबको भोग का बुखार चढ़ा है', 'सत्ता काजल की कोठरी बन चुकी है, जिसमें कोई दूध का धुला नहीं है', 'ब्रेक डाँस की महफिलें हैं, जहाँ इकतारा सुनने वाला कोई नहीं है' और 'पूर्व के अंधों को पश्चिम में उजियाला नज़र आ रहा है।' कवि ने जीवन के जटिल यथार्थ को भी धारदार भाषा में सहजता से प्रकट किया है।
नारी पूजक इस देश में आज यदि कोई सबसे अधित असुरक्षित है तो वह है नारी। जो गर्भ में भी सुरक्षित नहीं वह घर और समाज में कैसे सुरक्षित होगी? कवि जब नारी की दशा का वर्णन करते हुए कहता है-
हवा धूप से डरता जिसकी
बेटी हुई जवान भगत जी
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द्रौपदियों पर ही लगता है
दुर्योधन का दाँव भगत जी
तो आज के समाज का नंगा यथार्थ अपने विद्रूपित चेहरे के साथ सामने आ जाता है। इसी प्रकार जब कवि मौजूदा व्यवस्था के षड्यंत्रकारी शोषक चेहरे को बेनकाब करते हुए कहता है-
सस्ते शिक्षा ऋण पर चाहे
ध्यान न दे सरकार भगत जी
मगर कार ऋण देने खातिर
बैंक खड़े तैयार भगत जी
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जाने दस्यु-मुक्त कब होगी
लोकतंत्र की चम्बल भगतो
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लोकतंत्र में कुत्ता करता
हड्डी की रखवाली भगतो
तो भारतीय राजनीति का कड़वा सच सामने आ जाता है कि किस तरह लोकतंत्र में लोक उपेक्षित है।
कवि की पैनी नज़र से समाज की विसंगतियाँ और विद्रूपताएँ छुपी नहीं हैं। बुजुर्गों को आज जिस प्रकार से उपेक्षित और अपमानित किया जा रहा है वह दुखद और विचारणीय है-
जब से नई बहू आई है
बाहर बैठी माँ जी भगतो
कवि की भाषा मुहावरेदार है और कथ्य को प्रभावशाली बनाने के लिए उर्दू, फारसी, पंजाबी, अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ देशज शब्दों का भी प्रयोग किया है-
छाछ शिकंजी को धमकाता
अमरीका का ठंडा भगतो
है बंदर के हाथ उस्तरा
कर डालेगा कुंडा भगतो
कवि अपने परिवेश के प्रति सजग और संवेदनशील है। जल को व्यापार की वस्तु बना दिए जाने और अब तक स्वच्छ पेयजल उपलब्ध न होने पर कटाक्ष किया है-
क्या दारू क्या गंदा पानी
हमको मरना पीकर भगतो
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ढोर पखेरू निर्धन प्यासे
पानी के भी दाम भगत जी
चौतरफा पतन और गिरावट के बावजूद कवि निराश नहीं है, उसे यकीन है कि सुबह ज़रूर आएगी-
आशा से आकाश थमा है
कभी न छोड़ो आस भगत जी
अंधियारे के पीछे-पीछे
आता सदा उजास भगत जी
मीथकों का प्रयोग अत्यंत प्रभावी है। द्रौपदी, दुर्योधन, कृष्ण, कंस, राम, सीता, दसानन आदि का प्रयोग करके कवि ने अभिव्यक्ति को दमदार बनाया है। पेपर बैक इस 112 पृष्ठ वाली कृति की साज-सज्जा आकर्षक और मूल्य 125 रुपए बहुत वाजि़ब है। कबीर की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले इस संग्रह का साहित्य जगत से व्यापक स्वागत होगा, ऐसा विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है।

कृति-कौन सुने इकतारा
कवि-रमेश जोशी
पकाशक-अनुज्ञा बुक्स, शहादरा, दिल्ली
पृष्ठ-112 मूल्य-125 रुपए 

-रघुविन्द्र यादव

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