'कुण्डलिया संचयन' का प्रकाशन

आधुनिक छंद मुक्त कविता के दौर में प्राचीन भारतीय छंदों का चलन जैसे बीते युग की बात हो चला था| ऐसे में प्राचीन भारतीय छंदों को पुनर्जीवन प्रदान कर उन्हें पुनर्स्थापित करने में कई साहित्यकार बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं| त्रिलोक सिंह ठकुरेला सुपरिचित कुण्डलियाकार हैं। इन्होंने कुण्डलिया छंद के उन्नयन के लिए 'कुण्डलिया छंद के सात हस्ताक्षर' और 'कुण्डलिया-कानन' का सम्पादन किया है। अब श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा सम्पादित तीसरा कुण्डलिया संकलन 'कुण्डलिया संचयन' निकट भविष्य में साहित्यजगत के समक्ष होगा | कुण्डलिया संकलन 'कुण्डलिया संचयन' में सर्वश्री अशोक कुमार रक्ताले , डा.जगन्नाथ प्रसाद बघेल , डा.ज्योत्स्ना शर्मा ,परमजीत कौर 'रीत' ,डा. प्रदीप शुक्ल , महेंद्र कुमार वर्मा ,राजेंद्र बहादुर सिंह 'राजन' ,राजेश प्रभाकर , शिवानंद सिंह 'सहयोगी' , शून्य आकांक्षी , साधना ठकुरेला , हातिम जावेद , हीरा प्रसाद 'हरेंद्र' और त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुण्डलियां संकलित हैं|

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