भक्तिकालीन दोहों में मिथक : डॉ.सुमन शर्मा

मिथक जातीय जीवन की गतिशील चिंतन परम्परा होते हैं। यों वे स्वच्छ और निर्मल दर्पण हैं जिनमें कोई भी जाति अपने विश्वासों, परम्पराओं, जीवन-मूल्यों, आस्थाओं, सांस्कृतिक उत्थान-पतन, संघर्षों, विजयों-पराजयों, समष्टिगत विचारों, आदर्शों, कल्पनाओं, इच्छाओं, आकांक्षाओं, स्वप्रों, अनुभवों और संवेदनों के प्रतिबिम्ब देखती हैं| मिथक शब्द अंग्रेजी के मिथ शब्द का रूपान्तर है। इसका प्रयोग हिंदी में सर्वप्रथम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने किया था। उन्होंने इसे मिथुनीकृत मनुष्य भावों का बिम्ब कहा था। डॉ.रामसनेही लाल शर्मा के अनुसार ''मिथक पुराकथा, इतिहास, पुराण, धर्मकथा, कल्पकथा, गाथा, नाराशंसी, लोक गाथा और लोक विश्वासों का अद्भुत संगम होते हैं।" कोश के अनुसार ''मिथक में अतिमानवीय व अतिप्राकृतिक कार्यों का वर्णन होता है।" मिथकीय प्रयोग अभिव्यक्ति को सहज और प्रभावी बना देते हैं। पौराणिक नाम केवल नाम नहीं होते उनसे उनके चरित्र और उनके कार्य जुड़े होते हैं। कुंभकर्ण कहने पर अधिक सोने वाले आदमी का रूप उभरता है।
भक्तिकाल के कवियों ने अपने दोहों में मिथकों के प्रयोग से अभिव्यक्ति को जीवन्त व प्रभावी बनाया है। यथा-
मन मथुरा दिल द्वारका, काया कासी जाँणि।
दसवां द्वार देहुरा, तामें जोति पिछाँणि।।
यहाँ मथुरा, द्वारिका और कासी केवल शहरों का द्योतन नहीं कर रहे। इनके साथ सांस्कृतिक विश्वास और मिथकीय संवेदन जुड़े हुए हैं जिनके कारण अभिव्यंजना इन शहरों के नामों के अतिरिक्त भावात्मक बिम्बों को नये रंग देने में सफल है।
कबीर के अतिरिक्त तुलसी, रहीम, जायसी आदि ने भी मिथकों के प्रयोग से दोहों की अभिव्यंजना को नये आयाम दिए हैं। दृष्टव्य है-
क. राज करत बिनु काज हीं करहिं कुचाल कुसाज। 
तुलसी ते दसकंध ज्यों जइहै सहित समाज।।
ख. राज करत बिनु काज हीं, ठटहिं जे कूर कुठाठ।
तुलसी ते कुरूराज ज्योंं जहहै बारह बाट।।
इन दोहों में 'दसकंध' और 'कुरूराज' मिथक हैं, जिनके विनाश ही छवि उनके नामों से जुड़ी हुई है। रहीम ने भी मिथकीय प्रसंगों से अपने दाहों को नई छवि दी है। यथा-
क. रहिमन याचकता गहे, बड़े छोट है जात।
नारायण हू कौ भयौ बावन आँगुर गात।।
ख. थोरो किए बड़ेन की, बड़ी बड़ाई होय।
ज्योंं रहीम हनुमन्त को, गिरिधर कहत न कोय।।
उद्धरण 'क' में दृष्टांत के रूप में दूसरी संपूर्ण पंक्ति मिथक है जो प्रथम पंक्ति के अर्थ की पुष्टि करती है। उद्धरण 'ख' की दूसरी पंक्ति उत्पे्रक्षा अलंकार के माध्यम से प्रथम पंक्ति के कथ्य का उपमान बनकर आई है। तात्पर्य यह है कि मिथकों का प्रयोग भक्तिकालीन दोहों में प्रतीक के रूप में तो हुआ ही है, परम्परागत अलंकारों के रूप में भी हुआ है। मिथकीय प्रयोगों के कुछ अन्य दोहे दृष्टव्य हैं-
क. बचन हेत हरिचन्द नृप, भये सुपच के दास।
बचन हेत दसरथ दयौ, रतन सुतहि बनवास।।
ख. मान सहित विष खाय के, संभु भये जगदीस।
बिना मान अमृत पिये राहु कटायो सीस।।
ग. बसि कुसंग चाहत कुसल, यह रहीम जिय सोस।
महिमा घटी समुद्र की, राबन बस्यो परोस।।
उपर्युक्त दोहों में मिथक-प्रयोग शब्द स्तर से आगे जाकर वाक्य स्तर तक फैला हुआ है। रत्नावली के दोहे 'क' में वचन पालन मूल विषय है जिसकी पुष्टि और गहराई के लिए हरिशचन्द्र और दशरथ का मिथकीय प्रयोग किया गया है। रहीम के दोहे 'ख' में भी यही स्थिति है जिसमें मूल विषय सम्मान रक्षा है। सम्मान की रक्षा करते हुए शंभु विष पीकर जगदीश हो गए और राहु ने मान रहित रहकर अमृत पिया तो अपना सिर कटाया। इस दोहे में दोनों स्थितियाँ मिथकों से ही सिद्ध की गई हैं, इसे मिथक का दुहरा प्रयोग कहा जा सकता है। रहीम के 'ग' दोहे में दुष्ट के पड़ोस में बस जाने पर मिलने वाली पीड़ा को मिथकीय प्रयोग से स्पष्ट किया है। इन मिथकीय प्रयोगों ने एक ओर दोहे की अभिव्यंजना को नये आयाम दिए हैं, वहीं मिथक एक कारगर उपादान सिद्ध हुआ है।
मिथक प्रयोग के लिए दोहा उपयुक्त छंद है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मिथक का चाहे जितना बोझ लाद देने पर भी दोहे की छवि में गिरावट नहीं आयेगी। मिथक-प्रयोग यत्र-तत्र ही शोभा देता है, विधा चाहे दोहा हो या गीतिकाव्य। 'जो कवि अपने वक्र व्यापार को एक हल्की छुअन के साथ भाव के प्रकृत सौन्दर्य को उभारना जानता है, वही सफल गीतकार हो सकता है। बिम्बों और प्रतीकों की तह पर तह लगाकर भाव की तीव्रता को दफना देने वाला कवि गीति रचना में सफल नहीं हो सकता।' यह कथन जितना गीतिकाव्य और बिम्ब व प्रतीक के संदर्भ में सटीक है, उतना ही सटीक यह दोहा और मिथक के संदर्भ में भी है। तात्पर्य यह कि जिस प्रकार अलंकार काव्य का या दोहे का उद्देश्य नहीं होते उसी प्रकार मिथक-प्रयोग भी सहज भाव में ही सौन्दर्य की वृद्धि करता है। भक्तिकालीन कवियों ने इस तथ्य को बारीकी से समझा था। उनके दोहों में जहाँ भी मिथकीय प्रयोग हैं, वे सहज रूप में हैं तथा उनकी भरमार भी नहीं है।
'मिथकीय संदर्भों के प्रयोग से भाषा को गरिमा और कथ्य को एक नई भंगिमा मिलती है।' भक्तिकालीन दोहों में इस भंगिमा को स्पष्ट देखा जा सकता है। यथा-
समय परे ओछे बचन, सबके सहे रहीम।
सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम।।
यहाँ प्रथम पंक्ति में समय पडऩे पर दुष्टों के कटु वचन सुनने की विवशता के भाव को रूपायित करने में दूसरी पंक्ति अद्भुत भूमिका निभा रही है। अभिव्यक्ति की इसी भंगिमा के बल पर दोहा प्राणवान है, अन्यथा यह नीरस होकर रह जाता। स्पष्ट है यह भंगिमा मिथक-प्रयोग की है।
मिथकीय प्रयोग का एक पहलू और है, वह यह है कि मिथक युग बोध के रूपायन में विशेष रूप से सहायक होते हैं। इसलिए नवगीत के संदर्भ में डॉ.रामसनेही लाल शर्मा ने कहा है कि 'नवगीत में मिथकीय संदर्भों का सर्वाधिक प्रयोग युग बोध की अभिव्यक्ति के लिए किया गया है। आधुनिक युग की जीवनगत विसंगतियों और प्राणघाती यंत्रणाओं को विविध मिथकों के प्रयोग से बड़ी सार्थकता से व्यक्त किया गया है।' शिल्प का कोई भी उपादान हो, उसका जो मूल प्रकार्य होता है वह हर युग में प्राय: वैसा ही रहता है। अत: मिथक युगबोध के रूपायन का उपयुक्त उपादान भक्तिकाल में भी था और उस काल में इसे मिथक नाम से अस्मिता प्राप्त नहीं हुई। तात्पर्य यह है कि भक्तिकाल के दोहों में भी मिथकों से युगबोध को रूपायित करने में सहायता मिली। दृष्टव्य है-
क. मान्य मीत सों सुख चहैं सो न छुऐ छल छाहँ ।
ससि त्रिसंकु कैकई गति लखि तुलसी मन माहँ।।
ख. क्षमा बडऩ को चाहिए, छोटन को उतपात।
कहा विष्णु को घटि गयो, जो भृगु मारी लात।।
उद्धरण 'क' में छल का विरोध है। छल के दुष्परिणामों के शिकार मिथकीय नाम हैं-'ससि, त्रिसंकु, कैकई', जिनका भय दिखाकर कवि समाज को छल रहित बनाना चाहता है। जाहिर है यह 'चाहना' उस काल के युगबोध का सूचक है अर्थात भक्तिकाल में छल-प्रपंच से सामान्य जन पीडि़त थे। इसी प्रकार उद्धरण 'ख' में कबीर ने सहनशीलता और क्षमाशीलता जैसे गुणों और मूल्यों को अपनाने पर बल दिया है। प्रश्र उठता है, इसकी आवश्यकता उन्हें क्यों पड़ी? इसका एक ही उत्तर है और वह है कि उस काल में इन गुणों का अभाव था और कवि ने उसी युगबोध को इस दोहे में मिथक के सहयोग से रूपायित कर दिया। इस प्रकार भक्तिकालीन दोहोकारों ने दोहों में मिथक प्रयोग को कई दृष्टियों से अपनाया है। 
संदर्भ-
1.भारतीय मिथक कोश, संपादक डॉ.उषा पुरी, पृष्ठ-8
2.समकालीन हिन्दी साहित्य, डॉ.बच्चन सिंह, पृष्ठ-35
3, 14, 16.परामर्श, जून, 1991, पृष्ठ-145, 147, 148
4.मानविकी परिभाषिक कोश, डॉ.नगेन्द्र
5, 18.कबीर समग्र, संपादक युगेश्वर, पृष्ठ-293, 442
6, 7, 17.दोहावली, तुलसीदास, पृष्ठ-143, 143, 111
8, 11, 12. रहीम रचनावली, संपादक -सत्यप्रकाश मिश्र, पृष्ठ-78, 70, 68
9,10, 15.हिन्दी दोहा सार, संपादक -वरजोर सिंह सरल, पृष्ठ-60, 47, 58
13.गीति सप्तक, संपादक डॉ.राकेश गुप्त एवं ऋषिकुमार चतुर्वेदी, पृष्ठ-13

-डॉ.सुमन शर्मा, दिल्ली 


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