संवेदनाओं का विस्तार करता लघुकथा संग्रह : प्रतिबिम्ब

आधुनिक परिवेश और प्रकृति की उपज है - लघुकथा। लघुकथा की परिभाषा इसके नाम में ही शामिल है। यह सीमित आकार वाली वह कथात्मक रचना है जो द्वन्द्वमूलक नाटकीय प्रसंग विधान के माध्यम से विकृति पर प्रहार करके पाठकों को सही सांस्कृतिक दिशा में सोचने को प्रेरित करती है। लघुकथा की आकारगत लघुता उसे कलात्मक कसाव प्रदान करती है। साथ ही पाठक की संवेदनशीलता जगाकर मन की ऋतु का परिवर्तन कर सकती है। कहते हैं, लघुकथा लेखन गागर में सागर भरने जैसा है। बात ठीक है, परन्तु यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि सागर में कई विषैले जीव-जन्तु भी रहते हैं। इन सबको एक साथ भर लेने से गागरी फूटने का डर रहता है।

'प्रतिबिम्ब' की लघुकथाओं से गुजरते हुए पाया कि इन कथाओं में संवेदना व शिल्प का सुखद संयोजन है। लेखक के व्यक्तित्व में भावना व चिंतना का मनोहर सामन्जस्य दिखाई देता है। मूल्यों के विघटन की स्थिति में वह चिंतन में लीन हो जाता है तो पीडक़ प्रसंगों में भावुक हो जाता है। इन लघुकथाओं में स्वार्थ की नागिनें फुफकारती हैं तो परमार्थ के हिंडोले भी हैं।
भयावह स्थितियों के पीछे की मानसिकता को कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करने वाली रचनाएं किसे अच्छी नहीं लगेंगी? लघुकथा में हल्के व्यंग्य तथा मजबूत अस्वीकृति के साथ वक्रीय आक्रोश हो तो बड़ी बात होती है। इस दृष्टि से, नरेन्द्र गौड़ की लेखनी से निसृत करारे व्यंग्य से न शिक्षक बच पाया है, न पुलिस वाला, न दौलतमन्द, न राजनीतिज्ञ, न साहित्यकार और न ही मीडियामैन। यानि जो जैसा है, उसका बखान भी वैसा ही है।
अनेक लघुकथाओं में पैसा फेंक तमाशा देखने वाले, पैसे के लिए रिश्ते भुलाने वाले बहुतायत में हैं। साथ ही, पैसे को ढलती-फिरती माया की संज्ञा देकर इसके गुमान में न रहने वाले चरित्र भी हैं जो पाठक को सुकून प्रदान करते हैं। कई लघुकथाएं 'चलो गांव की ओर' का शंखनाद करती हैं। इससे सिद्ध होता है कि ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े और शहर की आधुनिकता के अंग-संग रह रहे लेखक ने गांव के जीवन को भली प्रकार जिया है, इसलिए उसे पूरी धज के साथ उपस्थित किया है।
'राक्षस और देवता' लघुकथा शिल्प की दृष्टि से अनूठी बन पड़ी है वहीं कथ्य की दृष्टि से 'भात', 'सुरक्षा गार्ड' आदि सशक्त रचनाएं हैं। 'यशोदा' एक मार्मिक रचना है जिसके ये शब्द देर तक कानों में गूंजते रहते हैं, 'इस बच्चे को जन्म चाहे किसी ने भी दिया हो किन्तु इसको गोद में खिलाने, नहलाने-धुलाने का सुख मैं लूंगी।' 'प्रतिबिम्ब' शीर्षक वाली लघुकथा मनोजगत् की प्रतिनिधि लघुकथा है जिसका कथानायक, अपना हो या गैर, हर किसी को बुराई की दलदल से बचाना चाहता है। 'मर गई संवेदनाएं' करारा तमाचा है उन स्वपोषी ताकतों पर जिन्हें अपने से आगे कुछ दिखाई नहीं देता।
'मां अभी जिन्दा है', अति भावपूर्ण रचना में दर्शाया है कि सारे रिश्ते एक तरफ, मां का रिश्ता दूसरी तरफ रखें तो मां का ही पलड़ा भारी रहता है। इन लघुकथाओं के विषय घर-परिवार की टोह लेते हुए, समाज व राजनीति की पगडंडियां फलांगते हुए विश्वग्राम तक पहुंचते हैं। अनुभूति के फलक से उतरे इन विषयों में पीढिय़ों का अन्तराल, भौतिकता की अंधी दौड़, रूढिय़ां-विश्वास, परम्पराएं, बालमन की सरलता, लोक दिखावा, सामाजिक विषमता, चरित्र का दोगलापन, बुजुर्गों की उपेक्षा,मूल्यों का अपघटन, व्यवहारगत छलावा, असीमित अपेक्षाएं आदि शामिल हैं। इसके साथ ही मानव मन की उदारता, सरलता, सादगी, त्याग, कर्तव्यपरायणता और संवेदनाओं के विस्तार का उजला अध्याय प्रस्तुत करती हैं। कितनी ही ऐसी लघुकथाएं हैं जिनमें पात्र तो आंसू पौंछते ही हैं, पाठक भी स्वयं को उसी धार मेंं पाता है।
संग्रह की भाषा सहज है। लेखक ने संवाद शैली व कहीं-कहीं वर्णनात्मक शैली अपनाई है। प्रश्रात्मक शैली भी है जिसने पाठक को सोचने को मजबूर किया है। चित्रात्मकता इन कथाओं का विशेष गुण है। आवरण कलात्मक व अर्थपूर्ण है। कुछ लघुकथाओं के शीर्षक कथ्य से मेल नहीं खाते। यहां और मन्थन किया जाना चाहिए था। कहीं-कहीं पात्रों की आयु का जिक्र अनावश्यक रहा है। कुछ एक लघुकथाओं के अंत में एक दो पंक्तियां फालतू-सी लगती हैं। कुल मिलाकर लघुकथाएं पाठक के मनोजगत् पर छाप छोड़ती हैं। लेखक को साधुवाद। 
 
-कृष्णलता यादव,गुरुग्राम - 122001
 
पुस्तक: प्रतिबिम्ब, लेखक: नरेन्द्र कुमार गौड़
प्रकाशन: सूर्यभारती प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य: 150 रू, पृष्ठ: 96, संस्करण: 2012 

No comments:

Post a Comment