दोहे - ऋता शेखर 'मधु'

शिखी शेर शतदल सभी, भारत की पहचान|
प्राणों से प्यारा हमें, जन गन मन का गान||

सर्व धर्म संपन्नता, भारत का है नूर|
दिल से दिल मिल कर रहें, खुशियाँ हों भरपूर||

जय भारत के घोष से, झूम उठा आकाश|
केसर हरा सफेद का, फैला प्रखर प्रकाश|

सोंधी खुशबू में बसे, मेरे तन मन प्राण|
आओ हम मिलकर करें, नव भारत निर्माण|

लोभ मोह में कट गए, जीवन के दिन चार|
मोक्ष क्षितिज पर है खड़ा, कैसे जाऊँ पार||

बैठो मिल-जुल दो घड़ी, तुम अपनों के पास|
पल भर दुख-सुख बाँट लो, मन में घुलें मिठास||

चंदा चंचल चाँदनी, तारे गाएँ गीत|
पावस की हर बूँद पर, नर्तन करती प्रीत||

हिल जाना भू-खंड का, नहीं महज संजोग|
पर्वत भी कितना सहे, कटन-छँटन का रोग||

बूढ़ी आँखें है विकल, कब आएगा लाल|
रात कटे उम्मीद में, पूछेगा वो हाल||

तरु फल फूलों से लदे, झुककर दें यह ज्ञान|
जिनमें भरी विनम्रता, वही लोग विद्वान||

कहाँ -कहाँ हैं गुण छुपे, ढूँढें धर कर धीर|
कालिख में हीरा मिले, बीच नारियल नीर||

सारे तीरथ पुण्य भी, खो देते हैं अर्थ |
पुत्रों के रहते हुए, दिखे पिता असमर्थ||

मोहन मथुरा जा बसे, बसी बिरज में पीर|
रोती छुप छुप राधिका, भर अँखियन में नीर||

-ऋता शेखर ‘मधु’

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