दोहे - प्रबोध मिश्र "हितैषी"

लघु दीपक भी जल उठा, लिए सबल विश्वास।
अंधकार घर ढूंढता, फैला जगत उजास।।

प्रकाश, दीप व रौशनी, किरण और उजियार।
खुशियों के ये नाम हैं, इस असार संसार ।।

धनतेरस धड़कन बने, दीवाली दिल यार।
सहेजना धन श्वेत को, है लक्ष्मी सत्कार।।

शुभ दीवाली आ गई, खर्चों की सौगात।
महंगाई व्याधि बनी, हुई हमारी मात ।।

वह पड़ोस का छोकरा, लगे टमाटर लाल।
और हमारे पुत्र की, लटक गई है खाल ।।

इधर दिवाली आ रही, महँगी शकर व दाल।
खाना तो मुश्किल हुआ, कहाँ मिठाई थाल।।

-प्रबोध मिश्र "हितैषी"

बड़वानी (म.प्र.)-451-551

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