सिंधी कहानी - कहानी और किरदार

मूल कहानी : डॉ. कमला गोकलानी
अनुवाद: देवी नागरानी

गौरव बिस्तर पर करवट बदलता रहा । कोशिश के बावजूद भी उसे नींद नहीं आई। साथ में लेटी सीमा ने फिर से जानने की नाकामियाब कोशिश की ।
‘आखिर क्या हुआ है ? इतने परेशान क्यों हो ?’ पर गौरव ने बिना जवाब दिये दूसरी तरफ़ पलटते हुए परमात्मा को प्रार्थना की, कि मानसी ने उसके मुत्तल्लक फ़ैसला लेते समय अपने पुराने स्वभाव से काम लिया हो ।
उसके सामने क्लास रूम का मंज़र उभर आया । बीस बरसों की नौकरी में उसने ख़ुद को इतना बौना महसूस कभी नहीं किया । बोर्ड ऑफ एड्यूकेशन की ओर से सेन्सर क्लासेज़ की परीक्षा ज़ारी है । आज उसकी ड्यूटी रूम नं. ४ में रही । उस कमरे में ड्यूटी करने से हर एक इनचार्ज कतराता है । आजकल आम तौर पर शागिर्द अड़ियल और ग़ैर जिम्मेदार ही है, पर रूम नं. ४ का राकेश, कहकर तौबा करलो! उसे नक़ल करने से रोकने वाले का, वह घर-बार डांवाडोल कर देता है । इसलिये राकेश के मामले में देखा अनदेखा करना पड़ता है, पर गौरव ईमानदारी और इन्तज़ाम का निबाह करने वाला है । इसलिये घर से निकलते वक़्त भी सीमा ताक़ीद देती रही कि जानबूझ कर विवेक के गुलाम बनकर अनचाही परेशानी न मोल लेना ।
जैसे कि आज बोर्ड से चेकिंग के लिये खास पार्टी आ रही है, इसलिये प्रिन्सिपल ने जान-बूझकर उसकी ड्यूटी रूम नं. ४ में लगाई ।
राकेश बेल बजने के १० मिनट पश्चात् ही क्लास में आता है । आज भी ऐसा ही हुआ, इसलिये गौरव ने यह सोचकर कि और शागिर्द को लिखने में बाधा न हो, उसे बिना तलाशी के परीक्षा लिखने दी और उसने सोचा कि चोर को सुराग़ के साथ पकड़ने का मौका भी मिलेगा ।
अभी पांच मिनट भी नहीं बीते कि चेकिंग पार्टी आ गई। उसके कमरे में पार्टी की कन्ट्रोलर मिस मानसी पहुँची, जो अपने सख़्त मिज़ाज के लिये मशहूर है । वह अक्सर अख़बार और मैग़ज़ीन्स में मानसी के बारे में पढ़ता था कि वह अपनी मेहनत और मज़बूती के बलबूते पर एक आम टीचर से इस अहम ओहदे पर पहुँची है। पर यह जानकारी फ़क़त गौरव को है, कि मानसी के सख़्त दिल होने का ज़िम्मेदार वह ख़ुद है। वह तो हँसती, खिलखिलाती मस्त रहने वाली ईज़ी गोइंग लड़की थी ।
‘टेक इट ईज़ी’ उसका तक़िया क़लाम रहा । इस क़दर कि ज़िन्दगी के अहम संजीदा मोड़ पर भी उसने किसी फ़ैसले को इतनी संजीदगी से नहीं लिया ।
जैसे बाज़ की तेज़ नज़र शिकार पर होती है, वैसे मानसी भी सीधे राकेश के टेबल के पास आ खड़ी हुई । राकेश बेफ़िक्र होकर कागज़ पर से सवालों का जवाब ढूँढ़ रहा था। मानसी ने गुस्से से गौरव से कहा - ‘मास्टर साहब ! इतनी ग़ैर जिम्मेवारी से ड्यूटी दे रहे हो ? आपने इस लड़के की तलाशी ली थी ? तुरन्त इसकी तलाशी ली जाए ।’ और फिर राकेश से मुखातिब होकर सख़्ती से पूछा - ‘तुम्हारा नाम क्या है ?’
राकेश ने शरारती मुस्कान के साथ कहा - ‘५३३४९५’ ।
मानसी ने कहा - ‘अपना ऐडमिशन कार्ड दिखाओ।’
राकेश ने जैसे ही जेब से अपना कार्ड निकाला, तो साथ में एक काग़ज ज़मीन पर गिर पड़ा। जाँच करने पर उस काग़ज पर नक़्ल करने वाले मैटर की अनुक्रम सूची थी कि कौन-सा मैटर कहाँ है। इस बीच गौरव ने राकेश की जेब से जवाबों के कुछ काग़ज निकाले, पर राकेश पर किसी बात का असर ही नहीं हुआ । इत्मीनान से जेब से कंघी निकाली और मानसी की आँखों में देखते हुए बालों को सँवारने लगा । उसे देखकर गौरव कुछ झेंप गए । मानसी को बीस साल पुराने मंज़र याद आए जब गौरव भी ऐसे ही उसकी आँखों में देखकर बाल संवारते हुए कहता था - ‘‘मानू बस ऐसे ही उम्र भर तेरे नयनों में निहारता रहूँ...’’ और मानसी गर्दन झुकाकर शर्माती थी । कुछ पलों में मानसी माज़ी की यादों से बाहर आई, जब गौरव चिल्लाया - ‘‘अरे इसके जुराबों में रामपुरी चाकू !’’
राकेश के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई का केस तैयार करने का फ़ैसला प्रिन्सिपल और तमाम टीम ने लिया, शायद यह ज़रूरी था, पर जैसे ही इस ग़ैर जिम्मेवार कार्य के लिये गौरव को दोषी ठहराते हुए उसके खिलाफ़ रिपोर्ट लिखने की शुरुवात मानसी ने की तो प्रिन्सिपल ने हाथ जोड़कर बिनती की - ‘‘मैडम ! ये ना इन्साफ़ी मत करना । गौरव इस स्कूल का निहायत ही ईमानदार और मेहनती शिक्षक है । मैंने इस साल उसका नाम शिक्षक पुरस्कार के लिये प्रपोज़ किया है । आपकी रिपोर्ट, उसकी की गई सालों की सेवा को दाग़दार बना देगी । दरअसल राकेश बदला लेने के लिये किसी भी हद तक गिर सकता है।’’
‘हूँ’ मानसी ने सख़्त लहज़े में कहा - ‘‘वो लड़का तो मेरे खिलाफ़ भी क़दम उठा सकता है, इसका मतलब यह तो नहीं कि गुनहगार को गुनाह करने की छूट दे दी जाए, उसके खिलाफ़ कोई कार्रवाई ही न की जाए ?’’
इतने में ‘पार्ट A’ पेपर के खत्म होने पर घँटी बजी और गौरव भी फ़ारिग होकर ऑफ़िस पहुँचा और अत्यन्त विनम्रता से कहा - ‘मैडम, आइ एम सॉरी’। दरअसल राकेश के क्लास में देर से आने के कारण मेरे मन में ड्यूटी और परिवार के फर्ज़ के बीच में जंग रही और आप आ गई । सीमा ने चलते-चलते भी कहा था - ‘बच्चों की क़सम, जानबूझकर कोई परेशानी मोल न लेना ।’
हालात देखते हुए मानसी ने फिलहाल काग़ज फाइल में रक्खे । वह एक बार फिर अतीत की ओर लौट गई । इस सीमा ने ही उसे गौरव से जुदा किया था । कुछ दिन तो वह बेहद मायूस रही, पर जल्द ही ख़ुद को संभालकर सारा ध्यान कैरियर पर लगा दिया । सोचती रही - ‘‘आज सीमा के एवज़ वही गौरव के बच्चों की माँ होती तो और क्या चाहती ?’’
उसे याद आया कि वह और गौरव एक ही स्कूल में शिक्षक थे । हमख़याली होने के नाते दोनों का उठना-बैठना साथ होता था । रिसेस के वक़्त, फ्री पीरियड में भी, जब दूसरे शिक्षक गैर ज़रूरी बातों में वक़्त जाया करते थे तब ये दोनों चाय पीते-पीते कभी अदब और कला के बारे में बातें, या बहस करते । किसी नई कहानी या नॉवल पढ़ने के पश्चात् उसका पोस्ट मार्टम करते, उसके किरदारों की कमज़ोरियों और खूबियों पर राय पेश करते । गौरव हमेशा उन नाटकों पर अफ़सोस ज़ाहिर करता जिसमें नायक अपनी नायिका को अज़ाबों की गर्दिश में छोड़कर, बुज़दिली से मैदान छोड़कर भाग जाते। बहस करते मानसी उसे समझाने की कोशिश करती कि सच्चा प्यार करने वाले नायक के लिये, ज़रूर कोई ऐसी मजबूरी रही होगी और वह बेहद लाचारी की हालत में प्यार को क़ुरबान करते हुए उस राह से मुड़ जाता होगा । सच्चा प्यार तो अमर है, कभी ख़त्म होने वाला नहीं । बड़ी बात तो यह है कि शादी और प्यार का इतना गहरा सम्बंध नहीं कि बिना उसके दीवानापन छा जाए । विपरीत इसके शादी के बाद फ़र्ज़ और हक़ों की जंग में ग्रहस्ती की ओढ़ी हुई जिम्मेवारियों की वजह से प्यार का नफ़ीस जज़्बा कुरबान हो जाता है ।
‘पागल है वो नायक जो रात-दिन प्यार-प्यार तो करते हैं, पर वक़्त आने पर पीठ दिखाकर नायिका को सारी ज़िन्दगी रोने के लिये छोड़ जाते हैं...’ गौरव बेहद संजीदगी से कहता और मानसी खिलखिलाकर जवाब देती - ‘‘गौरव ! टेक इट ईज़ी, क्यों सब कुछ सीरियस्ली लेते हो । कहानी के क़िरदार और हक़ीक़ी ज़िन्दगी में बहुत फ़र्क है। लेखक कहानी लिखने के पहले अपने किरदार का अंत तय कर लेता है, जो कभी सुखांत तो कभी दुखांत होता है । पर असली ज़िन्दगी में इन्सान हालात के बस होकर सुलह करते हुए फ़ैसला करता है । ऐसे फ़ैसले अज़ाब देने वाले और दुखदाई भी होते हैं, और न चाहते हुए भी ग़लतफ़हमियाँ पैदा करने वाले भी, और फिर दोनों के बीच में लम्बी खामुशी छा जाती थी ।’’
उनकी गुफ़्तगू अब स्टाफ रूम तक सीमित न रही थी । सुनसान वादियाँ, पहाड़ी-झरने, बहती नदियाँ, पेड़-पौधे उनकी मुलाक़ात के ज़ामिन रहे । ऐतिहासिक इमारतों की सैर करते वो दोनों भी ख़ुद को किसी राजा रानी से कम नहीं समझते । कभी-कभी मानसी गौरव से कहती - ‘अगर तुम्हारे माँ-बाप हमारे मेल-मिलाप को बर्दाश्त न कर पाए तो ?’ गौरव बिना किसी सोच के बुलंद आवाज़ में मर्दानगी दिखाते कहता - ‘मानू दुनिया की कोई भी ताक़त तुझको मुझसे छीन नहीं सकती । मैं जल्द ही पिताजी को मनाकर इस रिश्ते को सामाजिक मान्यता दिलाऊँगा ।’
पर, जब गौरव ने मानसी का ज़िक्र घर में किया तो गोया तूफ़ान उठ खड़ा हो गया । गौरव को यह पता नहीं था कि घर में उसे एक धड़कते दिल वाला इन्सान न मानकर, एक ‘चीज़’ समझकर उसके पिता ने उसका सौदा एक साहूकार की बेटी से कर दिया था और उनसे दहेज की बातचीत के आधार पर अपनी दो बेटियों के रिश्ते भी तय कर दिये थे । गौरव बहुत ही तड़पा, पर उसके पिता ने उसे लिखे हुए परचे दिखाते हुए कहा कि अगर वह इन्कार करेगा तो उसके माँ-बाप दोनों आत्महत्या कर लेंगे । पागलपन की हदों से गुज़रता हुआ गौरव स्कूल से छुट्टी लेकर घर बैठ गया, शायद मानसी से नज़र मिलाने की उसमें क्षमता न थीं । आखिर मानसी खुद उसके पास आई और गौरव ने आज जैसी ही लाचारगी से कहा था - ‘मानू, मेरे मन में प्यार और फर्ज़ के बीच...।’
मानसी ने शांत मन से कहा - ‘टेक इट ईज़ी प्लीज । हम कोई कहानी के क़िर दार नहीं हैं। मेरी चिंता मत करो, मुझमें यह सदमा बर्दाश्त कर पाने का आत्मबल है ।’
आज सीमा का नाम सुनते मानसी थोड़ी देर के लिये डांवाडोल हुई पर फिर सोचा बिचारी सीमा का क्या दोष ? यही कि वह एक धनवान की बेटी है और मानसी की ग़रीब विधवा माँ में दहेज दे पाने की तौफ़ीक़ नहीं थी । ये नहीं तो कोई और सीमा गौरव की जीवन संगिनी बन जाती थी । कोई भी औरत किसी और का हक़ छीनकर कहाँ चैन पा सकेगी? मानसी ने उस स्कूल से अपना तबादला करा लिया था । पर सीमा के बारे में स्टाफ से जानकारी मिली थी कि वह निहायत कोमल हृदय वाली नारी थी । उसे अगर पता होता तो वह ख़ुद ही मानसी के रास्ते से हट जाती । ख़ैर, ज़िन्दगी एक हक़ीकत है कोई कहानी नहीं । यह सोचकर मानसी ने गौरव के ख़िलाफ़ लिखी हुई रिपोर्ट फाड़ दी ।

 
अनुवाद: देवी नागरानी

जन्म: 1941 कराची, सिंध (पाकिस्तान), 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, एक अंग्रेज़ी, 2 भजन-संग्रह, 2 अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय संस्थाओं में सम्मानित , न्यू जर्सी, न्यू यॉर्क, ओस्लो, तमिलनाडू अकादमी व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। महाराष्ट्र साहित्य अकादमी से सम्मानित / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरुसकृत

संपर्क- 9-डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा, मुम्बई 400050॰ फोन:9987928358


 
 लेखक: डॉ. कमला गोकलानी
जन्म: सिंध (पाकिस्तान)

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