दोहा छंद - चन्द्रसेन विराट

दस्तक दी जब प्रेम ने, खुला हृदय का द्वार।
पिछले दरवाजे अहम्, भागा खोल किवाड़।।

जो मेरा वह आपका, निर्णय हो अभिराम।
मिले हमारे प्रणय को, शुभ परिणय का नाम।।

कोई पूछे, क्या कहें? क्या है उसका राज।
अपना परिचय प्रणय तक, कैसे पहुँचा आज।।

तन करता इकरार पर, मन करता इनकार।
देहाकर्षण उम्र का, वह कब सच्चा प्यार।।

देह रूप या रंग में, किसको कह दूँ अग्र।
सच तो यह है, तुम मुझे , सुन्दर लगी समग्र।।

अलग थलग होकर रहे, खुद को लिया समेट।
किंतु तुम्हारी नज़र ने, हमको लिया लपेट।।

तुमने बत्ती दी बुझा, जब हम हुए समीप।
लगा देव की नायिका, बुझा रही हो दीप।।

भरा रहा है प्रेम से , सतत आयु का कोष।
उससे मिली जिजीविषा, जीने का संतोष।।

जो भी है सौन्दर्य का, उच्च नया सोपान।
आज वहाँ तुम हो मगर, कोई नहीं गुमान।।

उथली भावुकता भरा, सुख सपनों का ज्वार।
देहाकर्षण है महज, कच्ची वय का प्यार।।

सही विषय संदर्भ में, सारे दृश्य सुशील।
रहता दर्शक दृष्टि में, श्लील या कि अश्लील।।

सुन तो लेते हैं उन्हें, लोग न करते गौर।
जिनकी कथनी और है, लेकिन करनी और।।

कभी बड़प्पन की कहीं, रही नहीं जागीर।
तुमको यदि होना बड़ा, खींचो बड़ी लकीर।।

गिनते हैं जब नोट सब, धन-अर्जन की होड़।
ऐसे मे कवि कर रहा, मात्राओं का जोड़।।

देर लगेगी धैर्य रख, छू पायेगा मर्म।
आते-आते आयेगा, यह कविता का कर्म।।

भाषा, शैली, कथ्य का, हो विशिष्ट अवदान।
इनका सम्यक मेल ही, है कवि की पहचान।।

प्रज्ञा के आलोक में, हुआ प्रेम-संबंध।
जीवन भर टूटा नहीं, देता रहा सुगन्ध।।

परिभाषाएँ लाख दें, पाप पुण्य की आप।
मन माने तो पुण्य है, मन माने तो पाप।।

आधी रोटी देस की, थी तो मान समेत।
पूरी है परदेस में, मगर ग्लानि की रेत।।

बेटी बेल अंगूर की, कुछ बरसों में दक्ष।
बेटा पौधा आम का, दशकों में हो वृक्ष।।

देता ताप, प्रकाश भी, ज्यों नभ का आदित्य।
त्यों साधे सत-हित वही, होता है साहित्य।।

-चन्द्रसेन विराट

121, बैकुंठ धाम कॉलोनी, इन्दौर

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