विवश खड़ा जनतंत्र - डॉ.रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर'

किरणों को अब लग गया, बदचलनी का चाव।
तम के सागर में रही, डूब धूप की नाव।।

यमुना तट पर राधिका, रोयी खो मनमीत।
सागर खारा हो गया, पीकर अश्रु पुनीत।।

अँधियारा बुनने लगा, सन्नाटे का सूत।  
भीतर-बाहर नाचते, विकृतियों के भूत।।

मंजि़ल आकर हो गई, खड़ी उसी के पास।
जिसके चरणों ने रखा, चलने का अभ्यास।।

सूरज का रथ पंक में, विवश खड़ा जनतंत्र।
बता रहे हैं विज्ञजन, किरणों का षड्यंत्र।।

सत्ता को कुछ शर्म दे, व्यथित मनुज को हर्ष।
मँहगाई को दे दया, मौला तू इस वर्ष।।

उनके सपनों को मिले, सोने वाला ताज।
किन्तु हमें मिलते रहें, रोटी, चटनी, प्याज।।

बैरिन वंशी बज उठी, चलो रचाने रास।
फागुन दुहराने लगा, कार्तिक का इतिहास।।

उमर निगोड़ी क्या चढ़ी, पवन छेड़ता गात।
सरसों सपने देखती, साजन के दिन-रात।।

जिसने मुझको पा लिया, छोड़ दिया संसार।
क्या अकबर की सीकरी, क्या दिल्ली दरबार।।

-डॉ.रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर'

86, तिलक बाईपास रोड़, फीरोजाबाद
9412316779

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