नहीं मिला ईमान - रमेश जोशी

नहीं नौकरी चाकरी, महँगाई की मार।
कुछ तो खुद का बोझ है, कुछ भारी सरकार।।

रेतीला है रास्ता, पैरों में जंजीर।
ऊपर से सिर पर तनी, सूरज की शमशीर।।

घर से निकले खोजने, सपनों की ताबीर।
हम तो पहुँचे बाद में, पर पहले त$कदीर।।

कमर झुक गई बोझ से, मान-मान आभार।
फिर भी आभारी करे, रोज-रोज सरकार।।

जनता औ' नेता करें, दोनों ही उपवास।
इसकी हैं मज़बूरियाँ, उसे ताज की आस।।

आग पेट में, भूमि पर, बिछे हुए अंगार।
बारादरियों में बजे, लेकिन राग मल्हार।।

गली-गली चर्चा हुई, बहुत हो गया नाम
अब सडक़ों पर आ गया, सत्ता का हम्माम।।

जीते वही चुनाव जो, खर्च कर सके दाम।
लोकतंत्र सारथि रहित, घोड़े बिना लगाम।।

दीपक लेकर ढूँढते, बड़े-बड़े इंसान।
पर राजा के महल में, नहीं मिला ईमान।।

कैसी-कैसी मिल रही, मौसम की सौगात।
आँखों से अम्बर झरे, अम्बर उल्का-पात।।

-रमेश जोशी

प्रधान सम्पादक, विश्वा,
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की पत्रिका, अमेरिका

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