प्यास सभी की एक - सतीश गुप्ता

रोटी ने पैदा किए, कोटि-कोटि जंजाल। 
भूख प्यास को ढूँढते, सूखा और अकाल।।
भूख रेत पर तप रही, प्यास तपे आकाश।
नज़र देखती शून्य में, टंगी स्वप्न की लाश।।
भूख सभी की एक सी, प्यास सभी की एक।
एक भूख के मायने, निकले सदा अनेक।।
रोटी सपने में मिले, इस नगरी की रीत।  
भूख प्यास हिल मिल रहें, करें परस्पर प्रीत।।
भूख रही है युद्धरत, वृद्ध हुई उम्मीद। 
फाका मस्ती में मने, दीवाली या ईद।।
बोझा ढोए उम्रभर, बिना सींग का बैल। 
टिका रहा है टेक पर, पुश्तैनी खपरैल।।
दूर बहुत होते गये, महलों से फुटपाथ।
निर्धनता की मित्रता, हर गरीब के साथ।।
झेली उसने हर समय, दुख दर्दों की मार।
फुटपाथों पर जि़न्दगी, सुख से रहा गुजार।।
पत्थर के बुत दे रहे, जीने का वरदान।   
भूखे प्यासे प्रार्थना, करें अकिंचन प्राण।।
जो न मरी वह भूख है, रहती तीनों काल। 
जो न बुझी वह प्यास है, सदा रहे बेहाल।।

-सतीश गुप्ता

के-221, यशोदा नगर, कानपुर
9793547629

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