किसकी बिखरी भावना - अशोक 'अंजुम'

किसकी बिखरी भावना, किसका टूटा नीड़।
नहीं समझती आँधियाँ, नहीं जानती भीड़।।
मिले सिपाही चोर से, $गायक हुए सबूत। 
दामन के धब्बे मिटे, न्याय हुआ अभिभूत।।
वही आज लेकर मिले, शीशी भर तेजाब।  
कल तक कसमें प्यार की, खाते रहे जनाब।।
अरी व्यवस्था क्या कहें, तेरा नहीं जवाब। 
जिनको पानी चाहिए, उनको मिले शराब।।
इस जनवादी सोच का, चित्र अनोखा देख।
पाँच सितारा में लिखें, होरी पर आलेख।।
पूछ रही हैं मस्जि़दें, मन्दिर करें सवाल।  
भला हमारे नाम पर, क्यों है रोज बवाल।।
मानवता की देह पर, देख-देखकर घाव।  
हम कबीर जीते रहे, सारी उम्र तनाव।।
घायल सब आदर्श हैं, सच है मरणासन्न।   
भरा-भरा याचक लगे, दाता हुआ विपन्न।।
डॉलर मद में चूर है, रुपया हुआ निढ़ाल। 
दिल्ली के दरबार में, बिखरे पड़े सवाल।।
मुट्ठी-भर थी चाँदनी, गठरी-भर थी धूप।
अंजुम जी प्यारा लगा, जीवन का हर रूप।।

-अशोक 'अंजुम'

संपादक, अभिनव  प्रयास, अलीगढ़
9258779744

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