जय चक्रवर्ती के समसामयिक दोहे

जय चक्रवर्ती के समसामयिक दोहे

वन वे ट्रैफिक जिंदगी, चलना ही संकल्प।
पीछे मुडऩे का यहाँ, कोई नहीं विकल्प।।
2
खंज़र उनके हाथ था, इनके हाथ त्रिशूल।
दोनों ही करते रहे, अपना $कजऱ् वसूल।।
3
नुचे पंख लेकर कहाँ, चिडिया करे अपील।
साथ शिकारी के खड़े, सत्ता और वकील।।
4
चलने को हमने चुनी, खुद अपनी ही राह।
नहीं किसी की राह से, माँगी कभी पनाह।।
5
सदियों लम्बे दौर में, इतना हुआ विकास।
फुटपाथों पर दुधमुँहें, मुर्दों को आवास।।
6
लुटी भक्त की अस्मिता, मौन रहे भगवान।
जैसी थी वैसी रही, चेहरे की मुस्कान।।
7
रोटी का इस मुल्क ने, जब-जब किया सवाल।
राजनीति ने धर्म का, जुमला दिया उछाल।।
8
झूठ और पाखण्ड से, जूझूँगा दिन-रात।
मुझमें जि़न्दा है अभी, कहीं एक सुकरात।।
9
मैं हँसता हूँ ओढक़र, सिर पर दुख का ताप।
इनमें या उनमें कभी, मुझ न ढूँढ़ें आप।।
10
शब्द हमारे ले सकें, ताकि समय से होड़।
$कतरा-$कतरा जिस्म से, हमने दिया निचोड़।।
11
मिले लेखनी को प्रभो, बस इतनी सौगात।
मौन रहूँ मैं सर्वथा, बोले मेरी बात।।
12
सच बोलूँ तो हर कदम, दुश्मन यहाँ हज़ार।
झूठ कहूँ तो खुद मरूँ, रोज हज़ारों बार।।
13
राम हुए जिस रोज से, नारों में तबदील।
जानी-दुश्मन हो गए, जमुना और जमील।।
14
चमन भोगता रात-दिन, पतझड़ का अभिशाप।
सावन के अंधे करें, हरियाली का जाप।।
15
यही प्रेम का अर्थ है, यही प्रेम का राग।
इधर-उधर दोनों तरफ, आँसू, आहें आग।।
16
छौनों के सपने छिने, गोरैया के नीड़।
लालकिला बुनता रहा, वादे, भाषण, भीड़।।
17
जो कुछ कहना था कहा, मुँह पर सीना तान।
एक आइना उम्र भर, मुझमें रहा जवान।।
18
राजा नंगा है मगर, कौन करे ऐलान।
सबकी आँखें बंद हैं, सबकी सिली ज़बान।।
19
वसुंधरा पर छेड़ कर, सर्वनाश का राग।
खोज रहे हम चाँद पर, मिट्टी पानी आग।।
20
कविता भाषण लेख अब, सब हो गए अनाथ।
धर्म और मजहब खड़े, हत्यारों के साथ।।
21
दरिया था, तूफान था, थी कागज की नाव।
पार उतरने का मिला, यूँ हमको प्रस्ताव।।
22
दिया किसी को कुछ कभी, कभी लिया कुछ छीन।
कुदरत तेरे न्याय का, प्रति-पल अर्थ नवीन।।
23
चली जि़न्दगी मौत की, $कदम-$कदम तकरार।
और अंतत: जि़न्दगी, गई मौत से हार।।
24
मोमबत्तियाँ, क्षोभ, दुख, बातों की तलवार।
मासूमों से रेप पर, सि$र्फ यही हर बार।।
25
जो भी आया दे गया, जलता एक अलाव।
मिले जि़न्दगी तू अगर, तो दिखलाएँ घाव।।
26
संविधान की देह पर, झपट रहे हैं चील।
मुर्दाघर में हो गया, लोकतंत्र तब्दील।।
27
महलों ने बुनियाद को, दिया क्रूस पर टाँग।
मिले हमें भी रोशनी, थी इत्ती-सी माँग।।
28
दुनियाभर के हल किये, यूँ तो कठिन सवाल।
काट नहीं पाये मगर, हम अपना ही जाल।।
29
समय लूटकर ले गया, सपनों की टकसाल।
जिये उम्र भर पेट के, हमने कठिन सवाल।।
30
कहाँ तलक चिडिय़ा जिये, ले साहस का नाम।
सैयादों के साथ है, सारा यहाँ निज़ाम।।
31
जब तक थे पूछा नहीं, कभी किसी ने हाल।
रुखसत होते ही जुटे, अजब गजब घडिय़ाल।।
32
दरबारों की गोद में, आप मनाएं जश्न।
हम तो पूछेंगे सदा, भूख-प्यास के प्रश्न।।

-जय चक्रवर्ती
एम.1/149, जवाहर विहार


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