सुवेश यादव के दोहे

सुवेश यादव के दोहे

पूँछ हिलाने लग गए, आगे पीछे श्वान।
भीखू चाचा गाँव के, जब से हुए प्रधान।।
2
मु_ी का जुगनू मरा, शोक करूँ या जश्र।
राजमहल की रोशनी, से मेरा यह प्रश्र।।
3
हँस मत रे अट्टालिके, तेरी क्या औ$कात।
जाग चुकी है झोपड़ी, देगी तुझको मात।।
4
रहा भरोसे वक्त के, होता रहा निराश।
कैंची उसके पास है, कतरन अपने पास।।
5
पूजन हवन उपासना, सबमें है बाज़ार।
सोशल से डिजिटल हुए, भारत के त्योहार।।
6
उपयोगी तकनीक का, करते गलत प्रयोग।
तितली के पर नोचकर, खुश होते हैं लोग।।
7
जय जय बोलें शेर की, गीदड़ से आदाब।
इतने बौने हो गए, वर्दी वाले साब।।
8
राजघरानो छोड़ दो, रक्तपान की चाह।
ले डूबेगी आपको, झोपडिय़ों की आह।।
9
झर-झर बूँदें झर रहीं, सुन्दर सुघर सुवेश।
माना पावस सुन्दरी, झटके गीले केश।।
10
क्यों करते हो दिल्लगी, दिल्ली के महबूब।
गाँव सियाना हो गया, तुम्हें समझता खूब।।
11
सागर समझी है जिसे, है वो गंदा ताल।
मछली! तू नादान है, नहीं समझती चाल।।
12
जंक फूड की चाह ने, छीनी रोटी दाल।
चूल्हा ठंडी राख से, कहता दिल का हाल।।
13
तेरा $कद भी कम नहीं, मत हो अभी निराश।
अरी झोपड़ी! छोड़ दे, राजमहल से आस।।
14
सैलानी परदेश का, गाथा करे बखान।
भारत की पहचान है, मरता हुआ किसान।।
15
कंगूरों पर है लिखा, चारण जी का नाम।
छुपी नींव की ईंट-सा, जनकवि है गुमनाम।।
16
गैया ने बछिया जनी, छाया था आनंद।
मैया ने बिटिया जनी, मुँह के ताले बंद।।
17
अपनी मिट्टी पर उसे, कैसे होगा नाज़।
जिसने पहना ही नही, खुद्दारी का ताज।।
18
ओ रे मांझी! छोड़ दे, दुविधा की पतवार।
मन में है विश्वास तो, हारेगी मझधार।।
19
उजियारे भी बाँटते, अलग-अलग परिणाम।
कुछ के हिस्से चाँदनी, कुछ से हिस्से घाम।।
20
मुआ मदारी दे गया, फिर नकली ताबीज़।
बदले में लेकर गया, बहुत कीमती चीज़।।
21
परदे पर तो दिख रहा, पर्वत-सा मजबूत।
लेकिन असली जि़ंदगी, इक कुचला शहतूत।।
22
किससे अपना दुख कहें, किससे जोड़ें प्रीत।
भय होता है देखकर, जग की उल्टी रीत।।








No comments:

Post a Comment