राजपाल सिंह गुलिया के दोहे

राजपाल सिंह गुलिया के दोहे

याद करे क्या जानकी, राम दशानन नेह।
इक मन में थी वासना, दूजे में संदेह।।
2
दया धर्म सद्भाव के, जो थे ठेकेदार।
आज वही हैं फिर रहे, लहराते हथियार।।
3
हालत मेरी जानते, फिर भी पूछें हाल।
कुछ ऐसे भी खींचते, लोग बाल की खाल।।
4
पिता पुत्र बोलें नहीं, सास बहू में रार।
कदम-कदम मिलने लगे, अब ऐसे परिवार।।
5
अर्थ लालसा कर रही, रिश्तों से खिलवाड़।
बुढिय़ा यौवन काल के, किस्से रही उघाड़।।
6
लोकतंत्र बस सिर गिने, देखे सिफ्त न खोट।
मैं भी इसमें वोट हूँ, तू भी इसमें वोट।।
7
दया धर्म सद्भाव के, जो थे ठेकेदार।
आज वही हैं फिर रहे, लहराते हथियार।।
8
बहुतेरे कहते मिले, क्या जाएगा साथ।
लेकिन मिला न एक भी, धरे हाथ पर हाथ।।
9
कोसो मत सरकार को, देखो अपना खोट।
किस लालच में डालकर, आये उस दिन वोट।।
10
आया है बदलाव का, जन में अनुपम दौर।
सुबह बात कुछ और थी, मिली शाम कुछ और।।
11
दूर नज़र से कर भले, दिल से नहीं निकाल।
जुड़ते कब फिर पात वो, तज दे जिनको डाल।।
12
फैला आज समाज में, खुदगर्जी का रोग।
फँूक झोपड़ा गैर का, चिलम भरें अब लोग।।
13
ऊँची पदवी आपकी, बड़ा आपका नाम।
लेकिन आती लाज है, देख आपके काम।।
14
निर्दोषी को दोष दें, करें मूढ़ का मान।
बिन माँगी जो सीख दे, अहम$क वे इंसान।।
15
इनको धन का गर्व तो, उनको रूप गुमान।
नाज़ किसी को ज्ञान पर, दंभी हर इंसान।।
16
रख लो अपने पास ही, राजा जी सौगात।
सबको खुश रखना नहीं, मेरे वश की बात।।
17
कटी तिमिर में जि़ंदगी, देखा नहीं चिराग।
वंशज उनके गा रहे, हैं अब दीपक राग।।
18
दिल को भी राहत मिली, मिली चैन की स्वाँस।
आखिर दिया निकाल ही, आज फाँस से फाँस।।
19
दुविधा में अब सत्य है, चुने कौन-सी राह।
लिए आँकड़े झूठ के, अड़ी खड़ी अफवाह।।
20
कैसे हम इकरार का, मानें यार सुझाव।
रँगे हाथ ये आपके, हरा हमारा घाव।।
21
जाने किस सैलाब की, जोह रहे वे बाट।
नदी किनारे बैठकर, ओस रहे हैं चाट।।
22
लोक लाज ने इस तरह, किया हृदय लाचार।
चाहत भी भयभीत थी, दुविधा में इजहार।।






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