सीमा पाण्डेय मिश्रा के दोहे

सीमा पाण्डेय मिश्रा के दोहे

सरस, सलीकेदार थे, जिन मंचों के कथ्य।
रूखे औ फूहड़ मिले, उनके ही नेपथ्य।।
2
सहमे जैसे नायिका, ऐसे डरे पगार।
महँगाई खलनायिका, खलनायक त्योहार।।
3
सागर के घर जा नदी, लगती है अनिकेत।
भीतर खारा जलमहल, बाहर सूखी रेत।।
4
धरती ऐसे सह रही, बारिश की बौछार।
जैसे बच्चा कर रहा, माँ पर नन्हे वार।।
5
भीख माँगते हाथ ही, हम क्या जानें पीर।
काँधे पर झोला नहीं, लटका हुआ ज़मीर।।
6
रही गरीबी छेंकती, जिनके ड्योढ़ी द्वार।
मुश्किल से आये कभी, उनके घर त्योहार।।
7
दूरी से ही जागते, मोह पाश के राग।
नजदीकी से चाँद में, दिखते काले दाग।।
8
गिरिवर की गोदी पली, नन्हीं पतली धार।
उद्गम का विश्वास है, नदिया का आधार।।
9
गहन प्रेम के भाव भी, नहीं चाँद का ज्ञात।
झाँक रहा है झील में, पर सूखा है गात।।
10
प्रेम सदा रहता नहीं, सदा रहे कब बैर।
लहर डुबो जाती वही, जो छूती है पैर।।
11
फूल सियासी हो गए, भँवरे हैं हैरान।
रंग चुनें अब कौन-सा, कहाँ करे मधुगान।।
12
लगातार संपर्क से, खोती मधुर सुगंध।
है दूरी और प्रेम में, सीधा सा संबंध।।
13
जिन शाखों ने ली तपिश, कर शीतलता दान।
उन शाखों को काटते, हत्यारे इंसान।।
14
याद पड़ा कुछ देर से, मेरे भी अरमान।
लेकिन तब तक हो गया, जीवन ही कुर्बान।।
15
रोटी के आकार से, कम वेतन का माप।
गरम तवे पर नीर के, छींटे बनते भाप।।
16
मैंने तो सींचा फ$कत, इक मुरझाया नीम।
दबे बीज भी हँस पड़े, क़ुदरत हुई करीम।।
17
चख पाते हम प्रेम का, अमरित स्वाद असीम।
उससे पहले चाट ली, घातक धर्म अफीम।।

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