सुबोध श्रीवास्तव के दोहे

सुबोध श्रीवास्तव के दोहे

जानें यह संसार का, कैसा अजब उसूल।
दुर्जन तो हैं मौज में, सज्जन फाँकें धूल।।
2
चाहे कितनी बार भी कर दो तुम संहार।
गाँधी करते हैं नहीं, कोशिश करो हज़ार।।
3
पण्डित ने गीता पढ़ी, मुल्ला ने कुरआन।
मन ही मन में कर लिया, हमने माँ का ध्यान।।
4
वाणी से टपके सुधा, मन में भरा गुरूर।
सज्जनता ऐसी भला, किसको है मंज़ूर।।
5
कितनी भी तब्दीलियाँ, कर ले यह संसार।
अपनी ही रफ्तार से, बहे समय की धार।।
6
हिंसा मुक्त समाज पर, नेता बाँटें ज्ञान।
अपराधी बेखौ$फ हैं, डरा-डरा इन्सान।।
7
सर्दी का मौसम रहे, या गरमी बरसात।
राम-राम करके कटें, निर्धन के दिन-रात।।
8
सारा ही सामथ्र्य था, मुखिया जी के पास।
वादे ही करते रहे, किया नहीं कुछ खास।।
9
मन में तो विष है भरा, रखें सुधा की चाह।
कैसे सुखमय हो भला, उनकी जीवन राह।।
10
महँगाई जालिम करे, रोज वार पर वार।
निर्धन के परिवार का, जीना है दुश्वार।।
11
दुनिया में कोई नहीं, है ऐसी तदबीर।
चाल समय की रोक दे, बदल सके तकदीर।।
12
सब अपने में ही रमें, देखें अपनी पीर।
बतलाओ कैसे मिलें, जग को नए कबीर।।
13
मेरी बातों पर भला, वह करता क्यों गौर।
उसका मत कुछ और था, मेरा था कुछ और।।


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