आशा खत्री के दोहे

आशा खत्री के दोहे

तन के राज निवास में, मन का भोग विलास।
चलता रहता हर घड़ी, राजा हो या दास।।
2
जीवन भर भूले नहीं, हम उसका उपकार।
दुख की घडिय़ों में दिया, जिसने हमको प्यार।।
3
रहे बुद्धि विपरीत तो टलता नहीं विनाश।
गली-गली बिखरी मिले, संबंधों की लाश।।
4
बदल गयी गणराज में, निर्बल की तकदीर।
एक घाट पर पी रहे, शेर-मेमना नीर।।
5
जिसको धोखा दे गये, रिश्ते दवा वकील।
उसको किसी गरीब की, आह गयी है लील।।
6
पहले चुग्गा डालकर, परखे बेईमान।
सफल नहीं हो चाल तो, झट ले गलती मान।।
7
सीमित रहती अर्थ तक, अब ‘बाबू’ की सोच।
वेतन ले सरकार से, जनता से उत्कोच।।
8
औरों के अवगुण गिनूँ, करूँ समय बरबाद।
इससे अच्छा है करूँ, अच्छी बातें याद।।
9
मन्दिर, मस्जिद घूमकर, मिला न मन को चैन।
हरी दुखी की पीर तो, सुख से बीती रैन।।
10
सुनकर मन की बात जो, बन जाते अ$खबार।
कैसे उनको हम करें, दुख में साझीदार।।
11
वहाँ प्रेम की भावना, क्या चढ़ती परवान।
जाति-पाति का विष जहाँ, उगले रोज ज़ुबान।।
12
खून बहा  मासूम का, रोया था दालान।
मगर रही थी गाँव की, उस दिन बंद ज़ुबान।।
13
इस दुनिया की भीड़ में, जो भी सच के साथ।
नहीं थामता दूसरा, आकर उसका हाथ।।
14
आजीवन भरते नहीं, ऐसे गहरे घाव।
जब अपने ही चल दिए, छोड़ भँवर में नाव।।
15
कई मंच यों हो रहे, तमगे देखर ख्यात।
ज्यों लंगर में बाँटते, हों भूखों को भात।।
16
पगडण्डी पर प्रेम की, फूल मिलें या खार।
चलते रहने का कभी, टूटे नहीं करार।।
17
हमने जिनके प्यार में, तोड़ी जग से डोर।
अब तो उनके तीर हैं, सिर्फ हमारी ओर।।
18
गायब है दिल से खुशी, मुखड़ों से मुस्कान।
अब रिश्तों के बोझ से, लोग हुए हलकान।।
19
आजीवन भरते नहीं, ऐसे गहरे घाव।
जब अपने ही चल दिए, छोड़ भँवर में नाव।।
20
किया भरोसा आम ने, मिला नहीं कुछ खास।
सत्ता तेरे रास भी, आये किसको रास।।
21
निकले हैं बाज़ार से, बचकर भी कुछ लोग।
नहीं जरूरी हो सभी को बिकने का रोग।
22
थक जाती हूँ जब कभी, कर-कर के तकरार।
तब लेता है मौन रह, अंतस तुम्हें पुकार।।
23
दीवारों के कान ने, किया खटेबा आज।
गलियों तक पहुँचा दिये, घर के सारे राज।।
24
संघर्षों के बीच जो, नहीं मानते हार।
दस्तक देती है खुशी, आकर उनके द्वार।।
25
बच्चे बिलखें भूख से, बरसें माँ के नैन।
बाप बना है बेवड़ा, उसे इसी में चैन।।
26
चाँद उतारे आरती, सूरज करे सलाम।
करके अच्छे काम जो, काम रहे हैं नाम।।
27
उसे सीढ़ी की खोज में, भटक रहे सब लोग।
जो शिखरों की राह का, बन जाये संयोग।।
28
आधी खाकर सो गया, आधी करके दान।
इक रोटी का आदमी, पूरा मिला महान।।
29
सोच-सोच कर थक गई, समझ न आई बात।
अपनों ने कैसे किया, अपनों से ही घात।।
30
दौलत पद बल नाम का, करता नहीं गुमान।
सज्जन का व्यवहार ही, है उसकी पहचान।।
31
फूलों में विषधर पलें, दिल में पलते शूल।
आस्तीन में साँप भी, खूब रहे फल-फूल।।




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