सत्यवीर 'नाहडिय़ा' के दोहे

सत्यवीर 'नाहडिय़ा' के दोहे
सच लिखती थी लेखनी, खतरे में थी जान।
इक दरबारी लेख से, मिले तीन सम्मान।।
2
बिना वर्तनी ज्ञान के, लिखी पुस्तकें तीस।
एक पेज में गलतियाँ, करते बस दस बीस।।
3
नाम देख लाइक करें, बिना पढ़े झट वाह।
ऐसे मित्रों ने किया, रचनाकर्म तबाह।।
4
मात-पिता हैं खाट में, बिना दवा बदहाल।
कावड़ लेने है गया, इकलौता ही लाल।।
5
भागदौड़ के दौर में, लोक हुआ बेढंग़।
सावन के झूले गए, फागुन के सब रंग।।
6
चहक उठें फिर वादियाँ, महक उठे परिवेश।
अमन-चैन जिंदा रहे, एक रहे यह देश।।
7
जनता को देने लगे, नेता जी यदि भाव।
ऐसा है तो मानिए, आए निकट चुनाव।।
8
कलयुग के इस दौर में, दरका है विश्वास।
इज्जत उसने लूट ली, जो था खासमखास।।
9
खपना होगा आप ही, रचना $गर इतिहास।
खुद में शामिल है खुदा, खुद में रख विश्वास।।
10
त्योहारों के बीच कल, आता था बाज़ार।
बाज़ारों के बीच अब, आते सब त्योहार।।
11
न्यायालय भी मौन हैं, क्या अब करें उपाय।
मिले वहाँ तारीख बस, मिले कहाँ कब न्याय?
12
फेसबुकी इस दौर में, यारों का यह सार।
वक्त पड़े पर एक ना, वैसे पाँच हजार।।
13
कोठी बँगला कार है, प्लॉट फ्लैट जागीर।
धेले की इज्ज़त नहीं, कैसे कहूँ अमीर।।
14
चुप हैं तुलसी-जायसी, कबिरा भी है मौन।
कालजयी दोहे कहो, आज लिखेगा कौन?
15
घर कच्चे थे जब सुनो, थे सब पक्के लोग।
घर जब से पक्के हुए, उलट हुआ संजोग।।
16
पत्रकारिता थी मिशन, आज हुई व्यापार।
लिखते थे दमदार वो, लिखते अब दुमदार।।
17
बिना बताये आपका, दर्द सदा ले जान।
मतलब के संसार में, उसको अपना मान।।
18
आदर सबका कीजिए, पर इतना हो ध्यान।
आँटी, मौसी से अधिक, हो माँ का सम्मान।।






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