डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' के दोहे

उनके अपने हित सधे, तोड़ गये जज्बात।
जिनके हम सम्मान में, मगन रहे दिन रात।।
2
नीति-न्याय बौने हुए, छलका नेह अगाध।
द्रौण अँगूठा ले गये, अर्जुन का हित साध।।
3
तुम प्रपंच, तुम झूठ हो, मैं जीवित विश्वास।
तुम सत्ता के बुलबुले, मैं शोषित की आस।।
4
मैं बैठा इस ठौर जब, वह बैठा उस ठौर।
आपस की त$करार में, जीता कोई और।।
5
सूरज को अब रोकिए, नहीं सहूँगा ताप।
सावन शिकवा कर रहा, मेघ सुनें चुपचाप।।
6
रोज बिछाते गोटियाँ, रोज खेलते दाँव।
जिन्हें सिखाया दौडऩा, काट रहे वे पाँव।।
7
मेरी-उसकी मित्रता, कब तक चलती यार।
चॉकलेट का केक मैं, वह चाकू की धार।।
8
बढ़ी आँख की रोशनी, फूले पिचके गाल।
बेटे ने परदेस से, पूछा माँ का हाल।।
9
आते हैं जब सामने, करें न कोई बात।
मोबाइल से भेजते, संदेशे दिन रात।।
10
राजा अपने काम का, करता रहा बखान।
सच से कोसों दूर थे, उसके दोनों कान।।
11
राह कँटीली हो भले, जीत मिले या हार।
आजीवन हमने किया, संकल्पों से प्यार।।
12
की घंटों लफ्$फाजियाँ, जिसने सीना तान।
आज मंच पर फिर हुआ, उसका ही सम्मान।।
13
जिप्सी क$फ्र्यू सायरन, आज़ादी का जश्र।
कब टूटेंगी चुप्पियाँ, शहर पूछता प्रश्र।।
14
सबने तय जब कर लिया, बदलेंगे सरदार।
राजा ने तब फिर गढ़ा, एक नया किरदार।।
15
अम्बर में ऊँचे उडूँ, तो भी रहूँ कबीर।
पैरों तले ज़मीन हो, जि़न्दा रहे ज़मीर।।
16
पढक़र उसने चुटकुले, दे दी सबको मात।
फूट-फूट रोती रही, कविता सारी रात।।
17
बुना भूख ने जाल यों, समझ न पाया चाल।
सत्ता के पट बन्द थे, बुधिया मरा अकाल।।
18
सम्मेलन में मसखरे, चला रहे हैं तीर।
इक-दूजे को कह रहे, तुलसी सूर कबीर।।
19
शब्द-शब्द मोती मिले, अक्षर-अक्षर भोग।
राजा के गुणगान का, लगा कलम को रोग।।
20
कलम भूप के सामने, जब-जब करती योग।
शील्ड शाल ईनाम का, बन जाता संजोग।।
21
भ्रष्ट आचरण भुखमरी, शोषण साजिश घूस।
कुर्सी सदियों से रही, आमजनों को चूस।।
22
कलुष नहीं होगा नहीं, होगी केवल प्रीत।
लिखती रहना लेखनी, मानवता के गीत।।
23
बच्चों को रोटी मिले, नेह मनाये गेह।
जैसे फिरकी नाचती, नाच रही है देह।।
24
हत्या डाका रेप के, जिन पर ढेरों केस।
वही जीतते अब यहाँ, भीड़तंत्र की रेस।।
25
मिलन विरह अनुभूतियाँ, मिथ्या थे संकल्प।
नेह पराया हो गया, आये नये विकल्प।।
26
कब तक उनको हम गुनें, कब तक करें प्रणाम।
संत वेष में भेडि़ए, बोल रहे हैं राम।।
27
कल के जैसा आज है, कल वाली ही चाल।
पाण्डव जंगल में फिरें, शकुनी मालामाल।।
28
तब पासे का खेल था, अब गाली बंदूक।
मदद माँगती द्र्रौपदी, सभा आज भी मूक।।
29
सूखे पोखर ताल हैं, पशु पक्षी बेचैन।
ज़र्रा-ज़र्रा जानता, किसने छीना चैन।।









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