वैशाली चतुर्वेदी के दोहे

वैशाली चतुर्वेदी के दोहे

कैसी मंगल की दशा, कैसी शनि की चाल।
रहना पृथ्वी पर हमें, चलो सुधारें हाल।।
2
कितने भी धारण करो, मूंगा पन्ना रत्न।
श्रम बिन कुछ हासिल नहीं, हैं फिजूल ये यत्न।।
3
सब ने पूजा चाँद को, छत पर था उल्लास।
सूने कमरे में मगर, विधवा रही उदास।।
4
तन्हाई से डर नहीं, लगी डराने भीड़।
जाने कब किस बात पर, उजड़े किसका नीड़।।
5
साँकल सूने द्वार की, आहट को बेचैन।
बूढ़ा पीपल गाँव का, तरस रहा दिन रैन।।
6
नेताजी के शेर पर, संसद में था शोर।
बेटी के अधिकार पर, खामोशी हर ओर।।
7
अधिकारों की माँग पर, मिलते हैं आघात।
बेटी कैसे बच सके, ऐसे जब हालात।।
8
आँगन से जो थे जुड़े, खत्म हुए व्यवहार।
ऊन सलाई क्रोशिया, पापड़ बड़ी अचार।।
9
थाली में भोजन नहीं, छत भी नहीं नसीब।
आजादी के जश्र को, देखे मूक गरीब।।
10
धीरे-धीरे ही सही, बदला जीवन रूप।
यादों में ही रह गई, आँगन की वो धूप।।
11
शामिल होकर भीड़ में, नहीं मिलाते ताल।
सच का पथ हमने चुना, चलते अपनी चाल।।
12
मीरा-सी पीड़ा कहाँ, जो कर ले विषपान।
इस तकनीकी दौर में, भाव हुए बेजान।।
13
भाई-भाई के लिए, होगा तभी अधीर।
जब दिल से महसूस हो, उसके दिल की पीर।।
14
उनके हक में भी लिखो, जिनके खाली हाथ।
सफल वही है लेखनी, जो है सच के साथ।।
15
शायर जी चुन कर कहें, कुछ मुद्दों पर शेर।
जोड़-जोड़ कर रख रहे, सम्मानों के ढेर।।
16
अधिकारों की माँग पर, मिलते हैं आघात।
बेटी कैसे बच सके, ऐसे जब हालात।।
17
आँसू सूखे आँख में, लिए बर्फ-सी पीर।
झील शिकारे देखते, सूना-सा कश्मीर।।
18
कैसे कर दे लेखनी, सत्ता का गुणगान।
जिसमें निर्धन पिस रहा, पनप रहा धनवान।।
19
नहीं जानता योग वो, नहीं जानता ध्यान।
श्रम ही जिसकी साधना, उसका नाम किसान।।

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