डॉ. सत्यवीर 'मानव' के दोहे

डॉ. सत्यवीर 'मानव' के दोहे

तेरी क्या औकात है, तेरी कौन बिसात।
घुटनों के नीचे रहे, सदा भेड़ की लात।।
2
सत्य हमेशा ही लगे, कडुआ जैसे नीम।
उससे बढक़र है नहीं, लेकिन मीत हकीम।।
3
बड़े-बड़े ज्ञानी गए, कितने दास कबीर।
जन-मन की बाकी रही, कहनी अब तक पीर।।
4
सत्य यही है जि़ंदगी, बदले हर पल रूप।
हरदम छाया ही नहीं, छाँव कभी हो धूप।।
5
बाधाओं से जो कभी, होता नहीं निराश।
अपने हाथों से लिखा, उसने ही इतिहास।।
6
मार-मार कर ठोकरें, देता वक्त तराश।
बदला हरदम है यहाँ, उसने ही इतिहास।।
7
जीवन के संग्राम में, हुई उसी की जीत।
अपने कदमों से लिखी, जिसने नूतन रीत।।
8
कड़वे बोल कबीर के, चुभते जैसे तीर।
लेकिन चूका कब कहाँ, कहने से सतवीर।।
9
समझ सत्य को बावरे, दुनिया एक सराय।
खातिर फिर इसकी करे, हाय-हाय क्यों हाय।।
10
नीचे धरती एक है, ऊपर अम्बर एक।
फिर क्यों हैं इंसान के, मजहब-जाति अनेक।।
11
बदले लय, सुर-ताल भी, बदला छंद विधान।
रस अब रिश्तों में नहीं, घर सब हुए मकान।।
12
सत्ता तो आई यहाँ, बोती सदा बबूल।
उससे करना आम की, आशा मीत फिजूल।।
13
यही जीत का सूत्र है, मीत यही है सार।
रखना हरदम पास में, हिम्मत के हथियार।।
14
होती हरदम एक-सी, पीर प्रीत की रीत।
दोनों अधरों पर धरें, आँसू भीगे गीत।।
15
बेटी को बेटी नहीं, समझे जो शैतान।
फाँसी क्यों उसको नहीं, देता चढ़ा विधान।।
16
वक्त-वक्त की बात है, वक्त-वक्त का खेल।
एक वक्त तो घी घना, एक वक्त ना तेल।।
17
क्या था, अब क्या हो गया, मत कर मीत मलाल।
खुद से होता कौन है, करता वक्त हलाल।।
18
नेता भरें तिजोरियाँ, जनता माँगे भीख।
सीख यही जनतंत्र की, सीख सके तो सीख।।
19
खस्ता हालत देश की, नेता मालामाल।
सत्ता फिर भी कह रही, जनता है खुशहाल।।
20
जब भी जीवन ने लिखे, बुरे दिनों के छंद।
तभी बंध-अनुबंध से, टूट गए संबंध।।
21
घाटी रह-रह रो रही, खड़ा हिमालय मौन।
आग लगी है बर्फ में, उसे बुझाये कौन?
22
सत्ता हमने क्या दई, हुए नशे में चूर।
हम से ही अस्तित्व है, हमसे ही हैं दूर।।
23
वेद सुने, गीता सुनी, गुरुओं के उपदेश।
अब संसद की गालियाँ, सुने विवश यह देश।।
24
प्यासी धरती पूछती, पूछें बंजर खेत।
ऐसी क्यों करनी करी, मानव उड़ता रेत।।
25
जनता ने ही है धरा, उनके सिर पर ताज।
जनसेवक फिर क्यों डरें, जनता से ही आज।।
26
राजनीति के रास में, सिमट गया संसार।
भरी पड़ी हैं सुर्खियाँ, पढ़ देखो अ$खबार।।
27
सच्चे साधक शब्द के, बेचें नहीं ज़मीर।
रहें पुजारी सत्य के, बनकर दास कबीर।।
28
लिखना सुरभित पुष्प से, तुम जीवन के छंद।
मुरझाने के बाद भी, बाकी बचे सुगंध।।
29
खाली भूखे पेट-सा, ढोता हुआ अभाव।
जीवन हुआ गरीब का, बुझता हुआ अलाव।।
30
दर्द जहां भर का सहा, एक लिखा तबगीत।
दर्द, दर्द, बस दर्द दे, गर है सच्चा मीत।।


-डॉ सत्यवीर मानव
642 सेक्टर-1, नारनौल
















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