सुशील सरना के दोहे

सुशील सरना के दोहे

माला फेरें राम की, करते गंदे काम।
ऐसे ढोंगी धर्म को, कर देते बदनाम।।
2
तुम तो साजन रात के, तुम क्या जानो पीर।
भोर हुई तुम चल दिए, नैन बहाएँ नीर।।
3
मर्यादा तो हो गई, शब्दकोष का भाग।
पावन रिश्तों पर लगे, बेशर्मी के दाग।।
4
अद्भुत पहले प्यार का, होता है आनंद।
रोम-रोम में रागिनी, श्वास-श्वास मकरंद।।
5
कहाँ गई पगडंडियाँ, कहाँ गए वो गाँव।
सूखे पीपल से नहीं, मिलती ठंडी छाँव।।
6
आभासी इस श्वास का, बड़ा अजब संसार।
मुट्ठीभर अवशेष हैं, झूठे तन का सार।।
7
हाथ जोड़ विनती करें, हलधर बारम्बार।
धरती की जलधर सुनो, अब तो करुण पुकार।।
8
जिसके मन की बन गई, जहाँ कहीं सरकार।
खुन्नस में वे कर रहे, भारी अत्याचार।।
9
काल न देगा श्वास को, क्षण भर की भी छूट।
खबर न होगी, प्राण ये, ले जाएगा लूट।।
10
अपनों से होता नहीं, अपनेपन का बोध।
अपने ही लेने लगे, अपनों से प्रतिशोध।।

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