चित्रा श्रीवास के दोहे

चित्रा श्रीवास के दोहे

मंदिर मस्जिद छोडक़र, करो ज्ञान की बात।
होती कोई है नहीं, मानवता की जात।।
2
चावल सब्जी दाल पर, महँगाई की मार।
कीमत सुरसा-सी बढ़ी, चुप बैठी सरकार।।
3
भेदभाव छल झूठ का, रचते माया जाल।
सत्ता सुख को भोगकर होते मालामाल।।
4
बाँट रहे हैं देश को, जाति-धर्म के नाम।
अपनी रोटी सेकना, नेताओं का काम।।
5
पीपल बरगद भी कटे, उजड़ गये हैं नीड़।
गौरैया बेचैन है, किसे सुनाये पीड़।।
6
फितरत सबकी एक-सी, किसको देवें वोट।
जन की आशा रौंदते, करते अक्सर चोट।।
7
जात-पात के भेद में, उलझ गया इंसान।
खून सभी का लाल है, कब समझे नादान।।
8
गुणवत्ता की आड़ में, निजीकरण का खेल।
सत्ता-साहूकार का, बड़ा अजब है मेल।।
9
उजले कपड़ों में मिलें, मन के काले लोग।
जनसेवा के नाम पर, करते सुख का भोग।।
10
अमरबेल से फैलते, कुछ परजीवी रोज
औरों का हक छीनकर, करते शाही भोज।।
11
रिश्ते-नातों से बड़ा, अब पैसा श्रीमान।
पैसे खातिर बेच दें, लोग यहाँ ईमान।।
12
बही बाढ़ में झोपड़ी, महल देखता मौन।
बेबस-बेघर की यहाँ, व्यथा सुनेगा कौन।।
13
बेटी तुलसी मंजरी, है पूजा का फूल।
हरी दूब की ओस है, सब खुशियों की मूल।।
14
दाँव-पेच से हिल गई, रिश्तों की बुनियाद।
जड़ें हुई हैं खोखली, तृष्णा से बर्बाद।।
15
बेटी मारें कोख में, देवी पूजें रोज।
मंदिर-मस्जिद घूमकर, करें देव की खोज।।
16
मनुज बड़ा है दोगला, अंदर-बाहर और।
करे दिखावा दान का, छीने मुँह का कौर।।
17
पाकर सत्ता सुन्दरी, फ़र्ज़ गये हैं भूल।
दोनों हाथों लूटते, छोड़े सभी उसूल।।

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