गए ये दीमक चाट - रमेश सिद्धार्थ

जात, पात, अरु धर्म पर, देखे विकट कलेश।
सुधेरेगा किस वक्त में, उ$फयह भारत देश।।
मंदिर मुद्दा आ रहा, नेताओं को रास।
साधू तो पाँसे बने, चौपड़ सम हैं न्यास।।
सत्ता की सीढ़ी बने, धर्म, जात अरु पात।
संख्याओं के खेल से, देते सब को मात।।
चहुँ दिस टूटे बुत दिखें, जले हुए अखबार।
घोटालों की पोटली, झूठों के अम्बार।।
मंत्री पद होने लगा, अब सचमुच बेजोड़।
सुख सत्ता के साथ में, जोड़ो लाख करोड़।।
रहे सदा से लूटते, जग को अंधा मान।
न्याय तराजू में तुले, अब मुश्किल में जान।।
कुछ ने गुपचुप लूट की, कुछ ने बंदरबाँट।
जड़ दुखियारे देश की, गए ये दीमक चाट।।
ऊँट अचम्भे में पड़े, जैसे देख पहाड़।
हर घोटालेबाज को, वैसी लगे तिहाड़।।
कल थी मन में आस्था, नैतिकता, विश्वास।
आज वहाँ आसीन हैं, स्वार्थ, भोग, विलास।।
खादी, कुर्ते हैं वही, बदल गए बस माप।
सत्य, अहिंसा, न्याय के, भाषण मात्र प्रलाप।।

-रमेश सिद्धार्थ

हाऊसिंग बोर्ड कॉलोनी, रेवाड़ी
9812299221

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