अरुण कुमार निगम के दोहे

अरुण कुमार निगम के दोहे

काट नहीं सकता अगर, कम से कम फँुफकार।
तब तेरे अस्तित्व को, जानेगा संसार।।
2
स्वर्ण जडि़त पिंजरे मिले, पंछी मद में चूर।
मालिक के गुण गा रहे, खा कर नित अंगूर।।
3
बच्चे बिलखें भूख से, पाषाणों को दुग्ध।
ऐसी श्रद्धा देखकर, क्या प्रभु होंगे मुग्ध।।
4
बिके मेघ कुछ कैद हैं, कुछ हैं कहीं फरार।
चार दिनों में गिर गई, सावन की सरकार।।
5
वंचित की आवाज़ को, जिसने किया बुलंद।
शासक ने फौरन उसे, किया जेल में बंद।।
6
ले दे के थे जी रहे, जाग गई तकदीर।
ले दे के मुखिया बने, ले दे हुए अमीर।।
7
वे कहते कुछ और हैं, करते हैं कुछ और।
खिला रहे हैं आँकड़े, बना-बना कर कौर।।
8
भोग रहे हैं कर्मफल, कर के अति विश्वास।
है विनाश चहुँ ओर अब, दिखता नहीं विकास।।
9
नहीं सुहाता आजकल, शब्दों में मकरंद।
इसीलिए लिखता अरुण, कटु सच वाले छंद।।
10
अजगर जैसे आज तो, शहर निगलते गाँव।
बुलडोजर खाने लगे, अमरइया की छाँव।।
11
अंधियारे पर बैठकर, सिर पर रखता आग।
उजियारा तब बाँटता, धन्य दीप का त्याग।।
12
वृक्ष कटे छाया मरी, पसरा है अवसाद।
पनपेगा कंक्रीट में, कैसे छायावाद।।
13
पौष्टिकता लेकर गई, भाँति-भाँति की खाद।
सब्जी और अनाज में, रहा न मौलिक स्वाद।।
14
आहत मौसम दे रहा, रह रह कर संकेत।
किसी नदी में बाढ़ है और किसी में रेत।।
15
वे कहते कुछ और हैं, करते हैं कुछ और।
खिला रहे हैं आँकड़े, बना-बना कर कौर।।
16
वन उपवन खोते गए, जब से हुआ विकास।
सच पूछें तो हो गया, जीवन कारावास।।
17
मनुज स्वार्थ ने मेघ धन, लिया गगन से छीन।
सावन याचक बन गया, भादों अब है दीन।।
18
रोजगार का दम घुटा, अर्थ व्यवस्था मंद।
ऐसे में शृंगार पर, कैसे गाऊँ छंद।।
19
कुछ कहता है मीडिया, कुछ कहते हालात।
किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ, मानूँ किसकी बात।।
20
तंत्र मत्र षड्यंत्र से, बचकर रहना मित्र।
पग-पग पर माया खड़ी, दुनिया बड़ी विचित्र।।
21
एकलव्य कौन्तेय में, रखे न कोई भेद।
ऐसा गुरुवर ढूँढ़ता, अरुण बहा कर स्वेद।।
22
धनजल ऋणजल का गणित, सिखा रही बरसात।
दिखा रही इंसान की, कितनी है औकात।।
23
भोग रहे हैं कर्मफल, करके अति विश्वास।
है विनाश चहुँओर अब, दिखता नहीं विकास।।
24
प्रायोजित सम्मान हैं, इनका क्या है मोल।
इन्हें दिखाकर बावरे, मत पीटाकर ढोल।।
25
राज हमारा है कहाँ, अब हैं हम भी दास।
दिल्ली भेजा था जिन्हें, तोड़ चुके विश्वास।।
26
अब कलियुग जीवंत है, संत लूटते लाज।
सत्य उठाता सिर जहाँ, गिरे वहीं पर गाज।।
27
कोठी आलीशान है, सम्मुख हैं दरबान।
जन सेवक के ठाठ को, देख सभी हैरान।।
28
मूढ़ बने विद्वान हैं, आज ओढक़र खाल।
इसीलिए साहित्य का, बहुत बुरा है हाल।।

1 comment:

  1. आदरणीय रघुविन्दर जी, मेरे दोहे चयनित करने हेतु आभार।

    क्रमांक 7 का दोहा, क्रमांक 15 में रिपीट हो गया है। एक दूसरा दोहा पोस्ट कर रहा हूँ यदि पास द आये तो क्रम के 15 हेतु स्वीकार करने का कष्ट करेंगे। नया दोहा -

    अपना बेड़ा गर्क है, उनका बेड़ा पार।
    लोकतंत्र को ढूँढिये, कहाँ पड़ा लाचार।।

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