टीकम चन्दर ढोडरिया के दोहे

टीकम चन्दर ढोडरिया के दोहे

धर्म सत्य की है डगर, सद्गुण का आगार।
हम मूरख करने लगे, उसका ही व्यापार।।
2
बूँदे बरसी रात भर, उठी धरा से गंध।
हरियाएँ फिर से सखी, सुप्त हुए संबंध।।
3
सुबह हिलें इस द्वार पर, शाम हिलें उस द्वार।
आज काइयाँ दौर में, दुमें बनी हथियार।।
4
जाता हूँ जब-जब कभी, मैं पुरखों के गाँव।
लिपट-लिपट जाती सखे, माटी मेरे पाँव।।
5
आजादी का अर्थ हम, समझे नहीं हुज़ूर।
पहले भी मजदूर थे, अब भी हैं मजदूर।।
6
संसाधन लूटे सभी, लूटे पद सम्मान।
हमने अपने हित रचे, सारे नियम विधान।।
7
राजतंत्र से है बुरा, आज तंत्र का रूप।
दो कोड़ी के आदमी, बने फिरे हैं भूप।।
8
खेत बिके जंगल कटे, गयी नदी भी सूख।
गाँवों को नित डस रही, महानगरिया भूख।।
9
काँकड़ से पहुँची नज़र, ज्यों ही मेरे गाँव।
अगवानी को आ गयी, यादें नंगे पाँव।।
10
कभी किया विष-पान तो, कभी पिया मकरंद।
हर पल का लेता रहा, जीवन में आनंद।।
11
सच का मैंने सच लिखा, लिखा झूठ को झूठ।
राजाजी चाहे भले, जायें मुझ से रूठ।।
12
यादों से भीगे हुए, महके-महके राज।
बहा दिये मैंने सभी, $खत दरिया में आज।।
13
जाति मनुज की सब कहें, सबसे उत्तम खास।
उसने ही सबसे अधिक, किया धरा का नाश।।
14
माना होती है कला, ईश्वर का वरदान।
मिलता है पर अब कहाँ, कलाकार को मान।।
15
आँखों पर जाले नहीं, ना मन में है चोर।
कैसे कह दें रात को, बोलो उजली भोर।।
16
औरों की तो बात क्या, तन भी जाता छूट।
जाने है सब कुछ मनुज, फिर भी करता लूट।।
17
मेडें़ सिमटी खेत की, कुएँ हुए वीरान।
आबादी ने डस लिए, सभी खेत-खलिहान।।
18
टूटी हैं कसमें कहीं, किया किसी ने याद।
आयी फिर से हिचकियाँ, मुझको बरसों बाद।।
19
बाँच सको तो बाँच लो, उसके उर की पीर।
अश्कों से लिक्खी हुयी, गालों पर तहरीर।।
20
स्वेद बिंदुओं ने लिखी, पाषाणों पर पीर।
फुरसत हो तो बाँच लें, आओ यह तहरीर।।
21
रोता है पहले सखे, कवि उर सौ-सौ बार।
तब पीड़ा के छंद का, होता है शृंगार।।

1 comment:

  1. ध्यानाकर्षण हेतु

    दोहा क्रमांक 7 कौड़ी
    क्रमांक 11 सच को मैंने
    क्रमांक 12 खत
    क्रमांक 17 मेड़ें

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