फणीन्द्र कुमार भगत के दोहे

फणीन्द्र कुमार भगत के दोहे

मुझे शत्रु का एक भी, चुभा नहीं था तीर।
खंज़र अपनों के मगर, गए कलेजा चीर।।
2
अपने कद से हैं बड़े, यूँ तो वृक्ष हजार।
लेकिन छायादार हैं, गिनती के दो चार।।
3
नौका जर्जर हो गई, टूट गई पतवार।
लगती है हर धार अब, मुझको तो मँझधार।।
4
उमरा बैठे हैं सभी, आज लगा चौपाल।
खोज रहे हैं लूट की, सारे मिल नव चाल।।
5
वैर भाव मन में पला, कलुषित हुए विचार।
मरहम विष लगने लगा, कैसे हो उपचार।।
6
गागर छलकी याद की, हुए नयन तट लाल।
पलको ने भी भीगकर, कहा हृदय का हाल।।
7
काँटों ने उलझा लिया, जब-तब रहे झँझोड़।
बिखरेगा गुल टूटकर, कहता यही निचोड़।।
8
सारी राहें बंद हैं, होता एक न काज।
मिली सजा की ही तरह, मुझे गरीबी आज।।
9
फूलों की मुस्कान पर, लगा रहे प्रतिबंध।
पंखुडिय़ों के लालची, जिन्हें न भाती गंध।।
10
कैसा है इन्सान का, यह निज से ही वैर।
कर बैठा है आज खुद, हर अपने को गैर।।
11
खुश था चंदा रात भर, मन में लिए उमंग।
भोर हुई तो चाँदनी, छोड़ गई सब संग।।
12
खाली बरतन और भी, लगने लगे उदास।
गुजरा जब आषाढ़-सा, सावन कर उपहास।।
13
पानी से सरकार के, जलने लगे चिराग।
फोहे केरोसीन के, बुझा रहे हैं आग।।
14
खुले द्वार दालान सब,मिट्टी की दीवार।
वक्त छीनकर ले गया, आपस का वह प्यार।।
15
चिंता करते लोग सब, बातें हर सरकार।
किस्मत मगर किसान की, लिखता सदा उधार।।
16
स्वप्न और सच्चाइयाँ जब हो जाएँ भिन्न।
तब होता है आदमी, हद से ज्यादा खिन्न।।
17
सावन ने नदियाँ भरी, कहीं तोड़ दी झील।
सींचे हैं बिन भेद के, बरगद और करील।।
18
नेह खत्म होने लगा, दिन-दिन घटती छाँव।
बहुत भुरभुरा हो गया, अब रिश्तों का गाँव।।
19
दीपक से भी आँधियाँ, छीन रही हैं नूर।
कैसे होगा रात का, यह अँधियारा दूर।।
20
मैं मानव ही था मगर, जग के पाल उसूल।
काँटे-सा सबको चुभा, क्या पत्ते क्या फूल।।

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