शिव कुमार दीपक के दोहे

शिव कुमार दीपक के दोहे

मेघा भी करने लगे, द्वेष पूर्ण व्यवहार।
हम जल से लाचार हैं, वे जल से लाचार।।
2
कैसे सुधरेगी यहाँ, हलधर की तकदीर।
गेहूँ से महँगा बिके, व्यापारी का नीर।।
3
कविता में जिनकी नहीं, आम जनों की पीर।
काम भाट का कर रहे, खुद को कहें कबीर।।
4
शोषण दहशत सिसकियाँ, पनपा घोर विषाद।
चोर सिपाही मिल गए, कौन सुने फरियाद।।
5
संकट का पर्वत उठा, पाली थी औलाद।
बूढ़ों की सुनता नहीं, अब कोई रूदाद।।
6
मापा सागर आपने और धरा का भार।
नाप सके कब भूख का, कितना है आकार।।
7
लूट अपहरण धमकियाँ, शोषण अत्याचार।
यक्ष प्रश्र हैं सामने, चुप है चौकीदार।।
8
मोबाइल ने कर दिए, सरल बहुत-से काम।
घर के अंदर लड़कियाँ, फिर भी नींद हराम।।
9
पंखों में कूवत कहाँ, जो भर सकें उड़ान।
पक्षी रखकर हौसला, नापे नभ का मान।।
10
गर्दन में लटका रहे, राम और हनुमान।
चाल-चलन से दिख रहे, रावण की संतान।।
11
जड़ें स्वर्ण के फ्रेम में, या कर दें दो टूक।
दर्पण सच ही बोलता, कभी न रहता मूक।।
12
जिस घर के मुखिया हुए, अवगुण के शौकीन।
उस घर में आदर्श की, बंजर रहे ज़मीन।।
13
क्यों दबंग तू बन रहा, ले टीले की आड़।
माँझी बन हम तोड़ते, मद में खड़े पहाड़।।
14
कहते भ्रष्टाचार पर, किया करारा वार।
दूनी रिश्वत माँगते, बाबू, थानेदार।।
15
निर्धनता करती मिली, हाथ जोड़ मनुहार।
पैसा आया, मद बढ़ा, गया हृदय से प्यार।।
16
दुनिया में मजदूर का, कैसा हाय नसीब।
अपने काँधे उम्रभर, ढोता रहे सलीब।।
17
अल्लाह हु अकबर कहें, या फिर जय श्रीराम।
उन्मादी इस भीड़ में, नफरत भरी तमाम।।
18
आशा रही न भोर की, चेहरे हुए निराश।
जब से तम के जुर्म में, शामिल हुआ प्रकाश।।
19
कवि का होना चाहिए, दर्पण-सा व्यवहार।
सच्चाई जिंदा रखे, करे झूठ पर वार।।
20
हरी मखमली चादरें, दिनभर चढ़ीं मजार।
ठिठुर-ठिठुर बुढिय़ा मरी, उसी पीर के द्वार।।
21
माखन मटकी से कहे, ध्यान न मेरी ओर।
अब मोबाइल माँगता, नन्हा नन्द-किशोर।।
22
आजादी के मायने, क्या जाने सय्याद।
पिंजरे में जो बंद है, करे सही अनुवाद।।







1 comment:

  1. सभी आदरणीय छंदकारों को बहुत बहुत बधाई💐

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