जे.सी. पाण्डेय के दोहे

पाण्डेय जे.सी. के दोहे

कहने को तो सब कहें, माँ से है घर-बार।
छोड़ गया वो कौन था, वृद्धाश्रम के द्वार।।
2
जीना तो संयोग है, साँसें मिली उधार।
मौत खड़ी महबूब-सी, लिए हाथ में हार।।
3
कहाँ चले तुम बाँधकर, पाँवों में ज़ंज़ीर।
तन-मन दोनों पर लगे, घाव बड़े गम्भीर।।
4
हुआ बैल-सा आदमी, बदल गयी है चाल।
किश्तों की रस्सी गले, डाल हुआ बेहाल।।
5
रिश्ते अपने बीच में, कैसे बनें प्रगाढ़।
तू सूखा है जेठ-सा, मैं सावन की बाढ़।।
6
चलता है हर रोज ही, लूटपाट का खेल।
कोई लूटे आबरू, कोई लूटे मेल।।
7
कठिन चुनौती है मगर, उठा हाथ हथियार।
बाहर दुश्मन हैं खड़े, भीतर कुछ गद्दार।।
8
इतराना किस बात का, पूजा के हम फूल।
पल भर को माथे चढ़ें, मिल जायें फिर धूल।।
9
मनसा वाचा कर्मणा, भाँवर लीं थी सात।
जीने दो सुख चैन से, मत देखो अब जात।।
10
दीन-हीन पर आपको, आ जाता है क्रोध।
महाबली को देखकर, हाथ जोड़ अनुरोध।।
11
कैसा ये संयोग है, कैसा मन का भाव।
सहलाया तुमने वहीं, जहाँ बना था घाव।।
12
मरघट में जलती चिता, देती मौन सलाह।
जलकर कुछ मिलता नहीं, मत कर मानव डाह।।
13
कैसे छू लूँ ये बता, हवा नहीं अनुकूल।
माथे का तू है तिलक, मैं चरणों की धूल।।
14
पीपल जैसा प्रेम है, उगे फाड़ चट्टान।
किसके उर में कब उगे, कौन सका है जान।।
15
आँखें उसको ढूँढ़ती, हो जिसकी दरकार।
कौन भला ढूँढ़े मुझे, मैं कल का अ$खबार।।
16
शील नहीं यदि रूप में, कौन कहे नायाब।
शोभा पाता है कहाँ, बिन पानी तालाब।।
17
कितना भी ऊँचा उठें, रहें सदा शालीन।
आसमान हो हाथ में, पाँवों तले ज़मीन।।
18
संघर्षों का दौर है, होना नहीं हताश।
थाम हथौड़ा ज्ञान का, खुद को तनिक तराश।।
19
साहस की दिल में कमी, मंजि़ल हो कुछ दूर।
तब कहती है लोमड़ी, खट्टे हैं अंगूर।।
20
हुआ बैल-सा आदमी, बदल गई है चाल।
किश्तों की रस्सी गले, डाल हुआ बेहाल।।


No comments:

Post a Comment