रामहर्ष यादव 'हर्ष' के दोहे

रामहर्ष यादव 'हर्ष' के दोहे 

जिन पर चलने चाहिएँ, कानूनों के तीर।
शासन उन्हें परोसता, सचिवालय में खीर।।
2
किसे पड़़ी कहता फिरे, पीडि़त जन की पीर।
दरबारों में चाकरी, करने लगे कबीर।।
3
बाबाजी प्रवचन करें, क्या जायेगा साथ।
चेले इधर वसूलते, चंदा दोनों हाथ।।
4
जिनको हितकारी लगें, लालच द्वेष दुराव।
उनकी आँखों किरकरी, सत्य प्रेम सद्भाव।।
5
पत्थर का होता रहा, पंचामृत अभिषेक।
इधर दुधमुँहे भूख से, रोते रहे अनेक।।
6
सहमी-सहमी द्रौपदी, कोस रही तकदीर।
दुष्ट दुशासन आज भी, खींच रहा है चीर।।
7
गोपी-गोकुल-ग्वाल सब, तकें चकित चहुँओर।
स्मृतियाँ नंद किशोर की, करतीं भाव विभोर।।
8
शोषित का शोषण रुके, हो समान व्यवहार।
संविधान की भावना, तब होगी साकार।।
9
लोगों की मतदान पर, मंशा ऊल-जलूल।
बोकर खेत बबूल का, चाह रहे फल-फूल।।
10
दागदार चेहरे हुए, लोगों के सिरमौर।
ऐसे में ईमान पर, कौन करेगा गौर।।
11
मजहब से लिपटे हुए, मानवता को छोड़।
लिखी ग्रंथ में बात का, है क्या यही निचोड़?
12
सहयोगी दल रुष्ट हो, कर बैठे हड़ताल।
चाह रहे वे लूट से, मिले बराबर माल।।
13
कमा-कमा कर थक गए, भरी न मन की जेब।
जीवन भर करते रहे, सारे झूठ फरेब।।
14
सावन सखी-सहेलियाँ, पावस कजरी गीत।
तेरे बिन बैरी लगें, ओ! मेरे मनमीत।।
15
ये कैसी उपलब्धियाँ, कैसा हुआ विकास।
दौलत की चाहत बढ़ी, रिश्तों का उपहास।।

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