गाफिल स्वामी के दोहे

गाफिल स्वामी के दोहे

अधिकारों की चाह में, लोग रहे सब भाग।
मगर कभी कर्तव्य की, जली न दिल में आग।।
2
झूठ द्वेष छल पाप का, पथ दुखदाई मित्र।
मिले सत्य की राह में, सुख की छाँव पवित्र।।
3
तन पर तो सत्संग का, चढ़ा हुआ है रंग।
मगर नहीं मन रह सका, कभी सत्य के संग।।
4
काया बूढ़ी हो गई, रुग्ण हुआ हर अंग।
फिर भी जीने की ललक, मन माया के संग।।
5
पैसा है तो जि़न्दगी, लगती बड़ी हसीन।
बिन पैसे संसार का, हर रिश्ता रसहीन।।
6
बिन धन के जीवन-जगत,  लगता है बेकार।
पैसे से जाता बदल, रहन-सहन व्यवहार।।
7
बिन मतलब जपता नहीं, कोई प्रभु का नाम।
दीन-दुखी धनवान सब, माँगे उससे दाम।।
8
कभी मिले यदि वक्त तो, देखो मेरा गाँव।
जहाँ पे्रम सद्भाव की, घर-घर शीतल छाँव।।
9
जाना इक दिन छोडक़र, धन-दौलत संसार।
फिर भी मूरख कर रहे, लूट ठगी व्यभिचार।।
10
काशी मथुरा द्वारिका, तीरथ किये हजार।
मगर न फिर भी खुल सका, मन मंदिर का द्वार।।
11
सुख-सुविधा से आज भी, गाँव बहुत हैं दूर।
मगर प्रकृति प्रभु प्रेम की, अनुकम्पा भरपूर।।

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