दोहा छंद में वर्णिक गणों का महत्व

दोहा हिन्दी काव्य की एक अचूक, सशक्त लघु छंद विधा है। 24-24मात्रााओं का दो पंक्तियों वाला यह छंद अपनी प्रभावशीलता, संक्षिप्तता, सशक्त अभिव्यक्ति, प्रांजलता, तीव्र स्मरणशीलता, मार्मिकता आदि तमाम गुणों के कारण प्राचीन काल से काव्य का सर्वाधिक जनप्रिय एवं लोकप्रिय छंद रहा है।48 मात्राओं में बँधा यह लघु छंद पाठक एवं श्रोता पर अणुबम के समान प्रहार करता है। इसमें अनन्त ऊर्जा का भंडार है। इसका सदुपयोग कोई सच्चा साधक ही कर सकता है। कविवर रहीम ने दोहे की विशेषता में कहा है-
दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहि।
ज्योंं रहीम नट कुंडली, सिमिट कू द चलि जाहि।।
अर्थात जिस प्रकार एक कुशल नट अपने शरीर को समेटकर एक छोटे से घेरे में कुशलतापूर्वक पार हो जाता है उसी प्रकार एक समर्थ दोहाकार थोड़े से शब्दों में बड़े-बड़े अर्थ को संजोने की सामर्थ्य रखता है।
दोहे के विषय में वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री चिरंजीत ने कहा है-''24-24 मात्राओं की दो पंक्तियों के दोहे की रचना बड़ी कठिन है। इस पर 'गागर में सागर' की कहावत लागू होती है। सही किस्म के दोहे के लिए भाषा कसी हुई, प्रांजलता, शब्दों की मितव्ययता, कथ्य की संक्षिप्तता एवं सांकेतिकता, वर्णन की चमत्कार पूर्ण अलंकारिकता, अनुभूति की मार्मिकता एंव सूत्र की सूक्तिपरक उद्धरणीयता आवश्यक है।"
उक्त गुणों से परिपूर्ण दोहा अभिरचन के लिए रचनाकार को निर्धारित माप-दण्ड, मात्रा विन्यास का उचित ज्ञान होना आवश्यक है। वरिष्ठ दोहाकार अशोक अंजुम ने कहा है-''केवल 13-11 के क्रम के साथ 48 मात्राएँ जोड़ लेने से ही दोहे की रचना नहीं होती, उसमें उचित प्रवाह अर्थात रगण, तगण,यगण... का सही सामंजस्य भी आवश्यक है।"
दोहा मुक्तक काव्य की श्रेणी में आता है और एक लघु मात्रिक छंद है। फिर भी दोहे को सही बुनावट, उचित प्रवाह प्रदान करने के लिए वर्णिक गणों की भूमिका महत्वपूर्ण है। गणों का विश्लेषण करने से पूर्ण गण की रूप-रेखा जानना आवश्यक है। वर्ण और मात्राओं के समूह को गण कहते हैं। गण दो प्रकार के होते हैं। वर्णिक गण और मात्रिक गण। लघु -गुरु के क्रम के विविध परिवर्तनों से वर्णिक गणों की संख्या आठ हो जाती है। तीन वर्णों का एक गण होता है। 
छंद शास्त्र के आचार्यों ने गणों के संबंध में एक सूत्र बनाया है वह इस प्रकार है- 'यमाताराजभानसलगा'
दस अक्षर का यह सूत्र है। आठों गणों के एक-एक सांकेतिक अक्षर तथा लघु-गुरु के लिए ल और ग को लेकर इस सूत्र की रचना हुई है। जैसे-यदि आपको यगण का लक्षण और स्वरूप जानना हो तो इस सूत्र के आरम्भ का य तो यगण के नाम के लिए और उसमें माता जोड़ देने से यगण (।ऽऽ) का उदाहरण हो जाता है। इसी क्रम से इसी सूत्र द्वारा आठों गणों के नाम व उदाहरण स्पष्ट हो जाते हैं।
छंद शास्त्र केे अनुसार मात्रिक गण पाँच प्रकार के होते हैं। इन्हें टगण, ठगण, डगण, ढगण तथा णगण नाम से पुकारा जाता है। टगण दो मात्राओं का, ठगण तीन मात्राओं का, डगण चार मात्राओं का, ढगण पाँच मात्राओं का तथा णगण छह मात्राओं का समुच्च होता है। इन समुच्चयों में लघु-गुरु क्रम बदलने से गण नहीं बदलता। उदाहरण के लिए रहीम और भारत में लघु-गुरु क्रम भिन्न है, परन्तु मात्राएँ दोनों में चार-चार हैं। अत: ये दोनों शब्द मात्रिक गण डगण हैं।
मात्रिक गणों में लघु-गुरु का उचित मात्रा विन्यास न होने के कारण काव्यशास्त्रीयों व कवियों ने इनका महत्व व उपयोग लगभग नकार दिया है। इन्हीं कारणों से मात्रिक गणों का अस्तित्व चर्चाओं व आलेखों से बहिष्कृत-सा हो गया है। दोहों के अभिरचन में प्रवाह व लय लाने के लिए गणों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जैसा कि सर्वविदित है दोहे के पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। दूसरे और चौथे चरण का चरणान्त दीर्घ-लघु (ऽ।) से होता है। दोहा मात्रिक छंद होने के बावजूद इसे वर्णिक गणों की विशेष बुनावट से गुजरना पड़ता है। मात्राओं की वांछित संख्या होने पर वर्णिक गणों की विशेष बुनावट के बिना छंद में प्रवाह नहीं आ सकता, फलस्वरूप विकलांगता आ जायेगी। वह छंद दोहा छंद की परिधि से बाहर हो जायेगा। दोहा तो ऐसा छंद है कि इसके किसी भी चरण में जरा-सी भी भूल, मात्रा का कम या अधिक होना, प्रवाह भंग आदि बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है।
आइये दोहा अभिरचन में प्रवाह व गति प्रदान करने के लिए प्रथम व तृतीय चरण में वर्णिक गणों की विशेष बुनावट अर्थात मात्रा विन्यास का विश्लेषण करते हैं। यहाँ हम वर्णिक गणों के लिए तालिका में दिए गए संकेत य,म,त तथा लघु के लिए ल गुरु वर्ण के लिए गा का प्रयोग करेंगे।
प्रथम व तृतीय चरणों का वर्णिक गणों की दृष्टि से विश्लेषण करने पर ऽ। रूप प्राप्त होते हैं। इन्हें हम निम्न आठ भागों में विभाजित कर सकते हैं-

1.यगण से प्रारम्भ चरण

सूत्र मात्रिक विन्यास उदाहरण 
ययलगा ।ऽऽ।ऽऽ।ऽ बिना जीव की सांस सों, (सार भस्म हो जाय)
यनभल ।ऽऽ।।।ऽ।।। वहै प्रीत नहिं रीति वह, (नहीं पाछिलो हेत)
यनर ।ऽऽ।।।ऽ।ऽ दया कौन पर कीजिये, (का पर निर्दय होय)
यननगा ।ऽऽ।।।।।।ऽ कथा कीरतन कुल विशे, (भव सागर की नाव)
यजस ।ऽऽ।ऽ।।।ऽ बिना मान अमृत पिये, (राहु कटायो सीस)

2.मगण से प्रारम्भ चरण

मतलल ऽऽऽऽऽ।।। ज्यों-ज्यों भीजे श्याम रंग, (त्यों-त्यों उज्ज्वल होय)
ममलगा ऽऽऽऽ।।।ऽ राधा-राधा रटत ही, (सब बाधा कटि जाय)
मसलगा ऽऽऽ।।ऽ।ऽ खीरा को मुँह काटिकैै, (मलियत नोन लगाय)
मतगा ऽऽऽऽऽ।ऽ यारो यारी छोडिय़े, (वे रहीम अब नाहि)
मनस ऽऽऽ।।।।।ऽ माला फेरत जुगभया, (फिरा न मनका फेर)
मसन ऽऽऽ।।ऽ।।। सोना, सज्जन, साधुजन, (टूट जुड़ैं सौ बार)

3.तगण से प्रारम्भ चरण

तयलगा ऽऽ।।ऽऽ।ऽ मेरी भव बाधा हरो, (राधा नागरि सोइ)
तननगा ऽऽ।।।।।।।ऽ पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, (पंडित भया न कोय)
तभनगा ऽऽ।ऽ।।।।ऽ माया मरी न मन मरा, (मर-मर गये शरीर)
तरलगा ऽऽ।ऽ।ऽ।ऽ माटी कहे कुम्हार सूँ, (तू क्या रौंदे मोय)
तजस ऽऽ।।ऽ।।।ऽ ऊँचे कुल का जनमिया, (करणी ऊँच न होय)
तनर ऽऽ।।।।ऽ।ऽ ऐसे घट-घट राम हैं, (दुनिया देखे नाहि)

4. रगण से प्रारम्भ चरण

रनभल ऽ।ऽ।।।ऽ।।। राम-राम कहि राम कहि, (राहु गये सुर धाम)
रनर ऽ।ऽ।।।ऽ।ऽ दीन बंधु विन दीन की, (को रहीम सुध लेत)
रयलगा ऽ।ऽ।ऽऽ।ऽ खैर, खून, खाँसी, खुशी, (बैर, प्रीति, मदपान)
रजस ऽ।ऽ।ऽ।।।ऽ सार-सार को गहि रहे, (थोथा देय उड़ाय)
रयन ऽ।ऽ।ऽऽ।।। बैर प्रीति अभ्यास जस, (होत होत ही होय)

5.भगण से प्रारम्भ चरण

भमलगा ऽ।।ऽऽऽ।ऽ या अनुरागी चित्त की, (गति समुझै नहि कोय)
भमन ऽ।।ऽऽऽ।।। धूप झरोखा तोडक़र, (पहुँचे उनके गेह)
भतनल ऽ।।ऽऽ।।।।। राम न जाते हिरन सँग, (सीय न रावण साथ)
भभनलल ऽ।।ऽ।।।।।।। ज्यों नर डारत वमन कर, (स्वान स्वाद सों खात)
भभभल ऽ।।ऽ।।ऽ।।। दादुर, मोर, किसान मन, (लग्यौ रहै धन माहि)
भसनगा ऽ।।।। ऽ।।।ऽ दीन सवन को लखत है, (दीनहि लखै न कोय)
भतस ऽ।। ऽऽ।।।ऽ दीरघ दोहा अरथ के, (आखर थोरे आहि)
भसभल ऽ।।।। ऽऽ।।। जान परत है काक पिक, (ऋतु बसन्त के मांहि)

6. नगण से प्रारम्भ चरण

नननस ।।।।।।।।।।।ऽ कल कल कह सरि पुलिन सों, (चली सिन्धु की ओर)
ननसलगा ।।।।।।।।ऽ।ऽ सुन-सुन कर युग की कथा, (काँप उठा है गात)
नयभल ।।।। ऽऽऽ।।। जिन दिन देखे वे कुसुम, (गई सो बीति बहार)
नरभल ।।।ऽ। ऽऽ।।। करि फुलेल को आचमन, (मीठी कहत सराहि)
नयर ।।।। ऽऽऽ।ऽ जब सब पीले हो गये, (तन उपवन के पात)
ननननल ।।।।।।।।।।।।। जियत मरत झुकि-झुकि परत, (जेहि चितवन इक बार)
ननतगा ।।। ।।।ऽऽ।ऽ करत-करत अभ्यास के, (जड़मति होत सुजान)
नजजगा ।।।।ऽ।।ऽ।ऽ पुरुष पुरातन की वधू, (क्यों न चंचला होय)

7.सगण से प्रारम्भ चरण

समलगा ।।ऽऽऽऽ।ऽ मान संन्यासी हो गया, (तन पर धूल सवार)
सभभल ।।ऽऽ।। ऽ।।। मन शैतान समान इस, (तन में करता खेल)
सनजगा ।।ऽ।।।।ऽ।ऽ उलझा मन नव रंग में, (फिर भी मिटी न प्यास)
सजर ।।ऽ। ऽ।ऽ। ऽ कबिरा खड़ा बजार में, (माँगे सबकी खैर)
सभनगा ।।ऽऽ।।। ।।ऽ जब मैं था तब गुरु नहीं, (अब गुरु है मैं नाहि)
सनजलल ।।ऽ।।। ।ऽ।।। कमला थिर न रहीम कहिं, (यह जानत सब कोय)
सतस ।।ऽऽऽ।।।ऽ परदा दीखा भरम का, (ताते सूझे नाहि)

8.जगण से प्रारम्भ चरण

जभनगा ।ऽ।ऽ।।।।। ऽ अमी हलाहल मद भरे, (स्वेत श्याम रतनार)
जमलगा ।ऽ।ऽऽऽ।ऽ सदा नगारा कूँच का, (बाजत आठों याम)
जभर ।ऽ।ऽ।।ऽ।ऽ सदा रहे नहिं एक सी, (का रहीम पछितात)
जतस ।ऽ। ऽऽ।।।ऽ सगे कुबेला परखिये, (ठाकुर गुनो कि आहि)
जसनगा ।ऽ।।। ऽ।।।ऽ नहीं छनन को परतिया, (नहीं करन को ब्याह)

नोट-1. दोहा का प्रथम व तृतीय चरण का प्रारम्भ पूरक शब्द जगण (।ऽ।) जैसे-अमीर, किसान, जमीन आदि से नहीं होता।
2. प्रथम व तृतीय चरण के अंत में यगण, मगण, तगण, जगण का प्रयोग नहीं होता।
दोहा के दूसरे व चौथे चरण का वर्णिक गण विश्लेषण-
दोहे का दूसरा व चौथा चरण 11-11 मात्राओं का होता है। इस चरण के अंत में गुरु-लघु (ऽ।) अनिवार्य रूप से आता है। केवल 11-11 मात्राओं की पूर्ति हो जाने से चरण का स्वरूप निर्धारित नहीं होता, इसके अभिरचन में वर्णिक गणों की व्यवस्था इस प्रकार है-

सूत्र मात्रिक विन्यास उदाहरण

ययल ।ऽऽ।ऽऽ। (जहाँ दया तां धर्म है), जहाँ लोभ तां पाप।
यनगाल ।ऽऽ।।।ऽ। (काटे चाटे स्वान के), दुहू भाँति विपरीत।
मसल ऽऽऽ।।ऽ। (बड़ा हुआ तो क्या हुआ), जैसे पेड़ खजूर।
तरल ऽऽ।ऽ।ऽ। (मिला रहे औ ना मिलै), तासों कहा बसाय।
तनगाल ऽऽ।।।। ऽ। (कबिरा धीरज के धरे), हाथी मन भर खाय।
रयल ऽ।ऽ। ऽऽ। (एक सिंहासन चढ़ गये), एक बांधि जंजीर।
रनगाल ऽ।ऽ।।। ऽ। (सदा रहै नहिं एक सी), का रहीम पछतात।
जयगाल ।ऽ। ।ऽऽऽ। (नहीं छनन को परतिया), नहीं करने को ब्याह।
जभगाल ।ऽ।ऽ।। ऽ। (रहिमन भँवरी के भये), नदी सिरावत मौर।
भमल ऽ।।ऽऽऽ। (सोना, सज्जन, साधुजन), टूट जुड़ैं सौ बार।
भनज ऽ।।।।।। ऽ। (लीक पुरानी को तजै), कायर, कुटिल, कपूत।
भभगाल ऽ।।ऽ।।ऽ। (जो पत राखन हार हो), माखन चाखन हार।
ननसल ।।।।।।।। ऽ। (जिन आँखिन सों हरि लख्यौ), रहिमन बल-बल जाय।
नयगाल ।।।।ऽऽऽ। (सनै-सनै सरदार की), चुगल बिगाड़े चाल।
ननत ।।।।।। ऽऽ। (काया काठी काल की), जनत-जनत सो खाय।
नरगाल ।।। ऽ। ऽऽ। (चतुरन को कसकत रहे), समय चूक की हूक।
नजज ।।।। ऽ।। ऽ। (औरन को रोकत फिरे), रहिमन पेड़ बबूल।
सनज ।।ऽ। ।।। ऽ। (एक रहा दूजा गया), दरिया लहर समाय।
समल ।।ऽऽऽऽ। (ऐसे घट-घट राम हैं), दुनिया देखे नाहि।
सभगाल ।।ऽऽ।।ऽ। (पंछी को छाया नहीं), फल लागे अति दूर।
ससगाल ।।ऽ।।ऽऽ। (करका मनका डार दे), मनका-मनका फेर।
उपर्युक्त विश्लेषण से दोहे की अभिरचना में 13-13 मात्राओं के चरण के लिए 51 सूत्र तथा 11-11 मात्रााओं के चरण के लिए 21 सूत्र प्रतिपादित किये गये हैं। दोहा छंद का और अधिक गहराई से विश्लेषण करने पर इनसे अलग नवीन सूत्रों की संभावना है। वर्णिक गण छंद को गति एवं प्रवाह प्रदान करते हैं। अत: दोहा अभिरचन में वर्णिक गणों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है।

-शिवकुमार 'दीपक'
हाथरस
सम्पर्क:- 9927009967


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