प्रोफ. शामलाल कौशल की कहानी - कटी पतंग

नेहा अपने मकान की बालकोनी में बैठी विचारों में गम-सुम है| अचानक आसमान से नीचे गिरती पतंग को देखती ही जिसे उठाने के लिए लडके भागते हुए आते हैं| उसे हासिल करने के लिए उनमें आपस में छीना झपटी होती है| देखते ही देखते पतंग फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है और किसी निर्जीव प्राणी की तरह धरती पर बिखर जाती है| दखकर नेहा को बहुत तरस आता है| कुछ पल पहले यही पतंग कितनी शान से आसमान में उड़ रही होगी? ऊँचे आसमान से बातें करते हुए नीचे की चीजों को अपने मुकाबले में कुछ नहीं समझती होगी| लेकिन अब बेचारी वही पतंग धरती पर टुकड़े-टुकड़े हुयी औंधे मुंह पड़ी है| लोगों की चप्पलों व जूतियों की एडियों से रौंदी जा रही है और उस पर कोई भी तरस नहीं खाता| अचानक नेहा को एक झटका-सा लगा| उसका हाल भी कटी पतंग की तरह ही तो है, जिसे हर कोई पकड़ना  चाहता है, उडाना चाहता है और जीवन का आनंद उठाना चाहता है| तो क्या ?.... सोच को पंख लगे तो उड़ चली अतीत की ओर |
नेहा अपने माँ बाप की इस्लौती संतान थी| पिता किसी कंस्ट्रक्शन कम्पनी के ठेकेदार थे| कितनी सड़कें, कितने मकान तथा कितने ही पुल बनाये थे उन्होंने| लाला किशोरी लाल ठेकेदार को कौन नही जानता था? दो नंबर का कारोबार करके उन्होंने बहुत सारा पैसे कमाया था| बड़े-बड़े अफसरों को गाँठ कर बहुत ऊँची पहुँच बना रखी थी उन्होंने| अपनी बेटी नेहा की हर फरमाइश वह कहने से पहले ही पूरी कर देते थे| जब वह बड़ी हुई तो उसे एम.बी.ए. करा कर उसका विवाह ललित नाम के सॉफ्टवेर इंजिनियर से करवा दिया जो किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था| विवाह खूब शानोशौकत से किया गया| जिले भर के आला ऑफिसर शामिल हुए थे इसमें| दहेज़ में लाला जी ने दिल खोलकर नेहा की पसंद की चीजें दी थीं| लेकिन विवाह क एक महीने बाद ही नेहा की अपने पति ललित से अनबन होने लगी| दोनों की पसंद, विचार और आदतें एक दूसरे से बिलकुल विपरीत थीं| बात-बात में एक दूसरे को नीचा दिखाना, ऊँचा बोलना तथा एक दूसरे पर हाथ उठाना उनकी दिनचर्या बन गई थी| रोज-रोज़ की कलह से दोनों का जीवन नर्क बना हुआ था| नेहा बात-बात में अपने पिता के ऊँचे रसूख, हैसियत तथा धन-दौलत की धौंस दिखाती थी| उसने अपने पति के खिलाफ अपने माँ-बाप के मन में इतना जहर भर दिया था कि वे भी अपने दामाद को अपमानित करने का कोई भी मौका नहीं जाने देते थे| एक दिन नेहा के माता-पिता की कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई| अब वह बिलकुल अकेली रह गई थी इस दुनिया में| पति, ललित ने उसे तसल्ली और सहारा देने की कोशिश की, परन्तु नेहा ने तो उसकी हर बात को जैसे उल्टा समझने की कसम खा रखी थी|
"अब तो खुश हो रहे होगे? लड्डू फूट रहे होंगे आपके मन में? मेरे माँ-बाप के मरने पर अब तो आपकी छाती से पत्थर हट गया होगा?" - कहकर नेह फूट-फूट कर रोने लगी थी| ललित ने उसे चुप कराने और सांत्वना देने की कोशिश की थी...मगर सब बेकार|
आखिर तंग आकर नेहा अपने माँ-बाप के मकान में आ गई| क्योंकि उसने एम.बी.ए कर रखी थी और उसके पिता का रसूख भी अच्छा था, इसलिए उसने सोचा कि क्यों न समय काटने के लिए वह किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ले| इस बीच उसका पति, ललित उसे मनाकर घर वापस ले जाने के लिए चार-पांच बार आया| लेकिन कुछ तो स्वाभाव से अहंकारी होने के कारण और कुछ माँ-बाप के लाड-प्यार से बिगडैल प्रवृति की होने के कारण अपने पति को दुत्कार दिया तथा अपमानित करके अपने घर से भगा दिया| त्रिया हठ के आगे राजाओं-महाराजाओं की भी नहीं चली तो बेचारे ललित की नेहा के आगे क्या चलती? औरत अगर किसी से प्यार करती ही तो सच्चे मन से करती है और अधिकतम करती है| वैसे ही अगर नफ़रत करती है तो भी सारी हदें पर करके करती है| बेचारा ललित अपनी ही पत्नी की नफरत का पात्र बनाकर नर्क भोग रहा था|
दिन महीनों में महीने सालों में बदल गए| आज पांच वर्ष हो गए हैं, नेहा अपने मायके घर में बैठी है| इस बीच दुखी तथा निराश ललित फिर कभी उसे मनाने नहीं आया| उसके अहंकार ने कभी उसे अपने पति के पास जाने नहीं दिया| उसके दफ्तर में काम करने वाले एक-दो मनचलों ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाने की कोशिश भी की, लेकिन वह जानती थी कि वे ऐसा या तो क्षणिक शारीरिक सुख के लिए कर रहे हैं या फिर उसकी भारी-भरकम धन-सम्पत्ति हडप करने के लिए उसे अपनी जीवन संगिनी बनाना चाहते हैं| अत: उसने उनकी सबकी तरफ से मुंह फेर लिया| कभी-कभी दफ्तर जाते-आते समय कुछ लोग ललचाई नज़रों से देखकर फिकर कसते तो उसे ऐसे लगता जैसे किसी ने उसके दिल पर तलवार चला दी हो| परन्तु इस सारे घटना चक्र के बावजूद वह लाचार थी|
आज उसके घर की बालकनी में से देखी कटी पतंग वाली घटना ने उसकी सोच को एक नया मोड़ दे दिया था| आज उसे लग रहा था जैसे वह खुद एक कटी पतंग हो जिसे हर कोई लूटना चाहता है और अगर वह किसी एक के हाथ न आई तो उसे पकड़ने वाले उसका हाल भी कटी पतंग जैसा ही कर देंगे और तब वह कहीं की नहीं रहेगी| यह विचार आते ही वह थर-थर कांपने लगी थी|
अहं और दुश्चिंताओं के द्वन्द से उबरी तो वह एक ठोस निर्णय ले चुकी थी| उसके कदम स्वत: ही बढ़ चले थे पति के घर की ओर ...अपने घर की ओर ...दृढ़ता के साथ|
आशा और विश्वास के नये उजाले में चिंताओं के बादल छंट गए थे|

- प्रो. शामलाल कौशल, रोहतक

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