हरिओम श्रीवास्तव के दोहे

हरिओम श्रीवास्तव के दोहे

छलनी बोली सूप से, गुप्त रखूँगी भेद।
नहीं कहूँगी मैं कभी, तुझमें कितने छेद।।
2
पति-पत्नि संतान में, सिमट गया परिवार।
मात-पिता ऐसे हुए, ज्यों रद्दी अ$खबार।।
3
टप-टप टपकी रातभर, रमुआ की खपरैल।
बाढ़ बहाकर ले गई, बछड़ा बकरी बैल।।
4
जिसको जो मिलता नहीं, लगे उसे वह खास।
लगे निरर्थक वह सभी, जो है जिसके पास।।
5
सावन से बरसात का, टूट गया अनुबंध।
मेघों को भाती नहीं, अब सौंधी-सी गंध।।
6
जिसको मिल जाए जहाँ, जब भी अपना मोल।
आदर्शों की पोटली, देता है वह खोल।।
7
अपनी भूलों पर सभी, बनते कुशल वकील।
गलती हो जब और की, देते तनिक न ढील।।
8
लक्ष्य प्राप्ति उसको हुई, जिसने किया प्रयास।
प्यासे को जाना पड़े, स्वयं कुए के पास।।
9
जो भी आया है यहाँ, जाएगा हर हाल।
निकट निरंतर आ रहा, काल साल दर साल।।
10
रखना हो जब व्यक्ति को, अपना कोई पक्ष।
मंदबुद्धि भी उस समय, लगता है अति दक्ष।।
11
फैशन की इस देश में, ऐसी चली बयार।
महिलाओं को लग रहा, वस्त्रों का ही भार।।
12
करता है वनराज भी, उठकर स्वयं शिकार।
मृग खुद सोते सिंह का, बने नहीं आहार।।



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