प्रेमचंद का पशु प्रेम : एक परिचय

    मुंशी प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के एक ऐसे रचनाकार थे जिनका साहित्य भारतीय जनमानस मे हमेषा से ही लोकप्रिय रहा है, उन्होने साहित्य की लगभग सभी विधाओ मे खूब लिखा परन्तु जितनी ख्याति उन्हे कहानियों के माध्यम से मिली वह अन्य विधा मे लिखे साहित्य से नही । उनकी लिखी कहानियों ने हमेषा से ही पाठको का भरपूर मार्गदर्षन व ज्ञानवर्धन किया । उनका लिखा साहित्य हमेषा से ही प्रासंगिक रहा है । प्रेमचंद साहित्य के प्रसिद्ध मनीषी व चिंतक डॉ0 कमल किषोर गोयनका अपनी पुस्तक 'प्रेमचंद: कहानी रचनावली' (भाग-6) मे प्रेमचंद की उपलब्ध 298 एवं अनुपलब्ध 03 हिन्दी-उर्दू कहानियों के संबंध मे सूचना प्रदान करते है । इस पुस्तक मे प्रेमचंद की उपलब्ध सभी 298 कहानियां कालक्रमानुसार अर्थात् कहानी के प्रथम प्रकाषन वर्ष चाहे वह सर्वप्रथम उर्दू मे हुई हो या हिन्दी मे हो, के रूप मे संकलित की गई है । प्रेमचंद की इन 298 हिन्दी-उर्दू कहानियों का अवलोकन करने के पश्चात् ज्ञात होता है कि प्रेमचंद ने इन कहानियों मे कई विषयों को लेकर बेहतरीन कहानियों की रचना की है । इन कहानियों मे दलित-विमर्ष की कहानियां, नारी चितंन की कहानियां, गांवो से संबंधित कहानियां, सामाजिक कहानियां, हिन्दू-मुस्लिम संबंधी कहानियां, देषप्रेम संबंधी कहानियां, पशु पक्षियों पर आधारित कहानियां, हाष्य व्यग्ंय पर आधारित कहानियां, बालको के लिये लिखी गयी कहानियां आदि देखने को मिलती है ।
    प्रेमचंद की पत्नी श्रीमती षिवरानी देवी अपनी पुस्तक 'प्रेमचंद: घर में' भी एक जगह प्रेमचंद के पशुप्रेम की जानकारी देती है । उनके अनुसार-''एक बार की बात है । मैं बीमार थी । मुझे दस्त की बीमारी थी । मेरा लडका धुन्नू आठ महीने का था । बीमार कई महीने रही । डाक्टरो को आषंका थी कि अपने बच्चे को मैं दूध पिलाती रही तो तपेदिक हो जाने का पूरा खतरा है......इस पर प्रेमचंद जी ने एक बकरी मंगवायी । बच्चे के लिये जब भी दूध पीने की जरूरत पडी, खुद दुहते । चाहे कोई समय क्यो न हो ।'' (प्रेमचंद: घर मे, पृष्ठ: 61-62) इसी पुस्तक मे षिवरानी देवी प्रेमचंद के गाय प्रेम के संबंध मे एक रोचक प्रसंग की जानकारी देते हुये कहती है कि-''जब मै गोरखपुर में थी, तो मेरे गाय थी । वह गाय एक दिन कलेक्टर के हाते मे चली गई । कलेक्टर ने कहला भेजा कि अपनी गाय ले जाये । नही तो मैं गोली मार दूंगा......साहब के पास जाकर आप बोले-'आपने मुझे क्यों याद किया ? ' 'तुम्हारी गाय मेरे हाते मे आई । मैं उसे गोली मार देता । हम अंग्रेज हैं ।' 'साहब, आपको गोली मारनी थी तो मुझे क्यो बुलाया ?' 'आप जो चाहे सो करते । या आप मेरे खडे रहते गोली मारते ?' 'हां, हम अंग्रेज है, कलक्टर है । हमारे पास ताकत है । हम गोली मार सकता है ।' 'आप अंग्रेज है, कलक्टर है । सब कुछ है, पर पब्लिक भी तो कोई चीज है ।' 'मैं आज छोड देता हॅू, आइन्दा आई तो हम गोली मार देगा ।' (प्रेमचंद: घर मे, पृष्ठ: 64) इस प्रकार प्रेमचंद अंग्रेज कलेक्टर से अपनी गाय को छुडाकर ले आते है जो उनकी पशुओ के प्रति प्रेम व वफादारी को दर्षाता है ।
    प्रेमचंद कहानियों मे पुरूष पात्रों के माध्यम से अपनी बातो को कहने का सामथ्र्य तो रखते ही थे उन्होने पशु पक्षियों के माध्यम से भी अपने विचारों को पाठको तक बखूवी पहुंचाया है । प्रेमचंद की उपलब्ध 298 कहानियों का अवलोकन करने पर हमे पशु पक्षियों पर आधारित कई बेहतरीन कहानियां देखने को मिलती है इन कहानियों के केन्द्र मे कहीं न कहीं पशु पक्षियों का योगदान रहा है । यह सभी कहानियां रोचक व षिक्षाप्रद है ।
    प्रस्तुत आलेख मे प्रेमचंद की पशु पक्षियों पर आधारित कहानियों के संबंध मे विस्तृत चर्चा करने का प्रयास किया गया है, ताकि पाठक जान सके कि प्रेमचंद पुरूष पात्रों के अलावा मूक पशु पक्षियो से भी बात कहलवा सकते थे । प्रेमचंद की इन पशु पक्षियो पर आधारित कहानियों मे ऐसा जान पडता है जैसे ये निरीह पशु पक्षी बोलना जानते हो । यह एक विलक्षण रचनाकार की लेखनी का ही जादू था जो पाठको को ऐसी-ऐसी सुन्दर रचनाये प्राप्त हुई । नीचे ऐसी ही पशु पक्षियों पर आधारित कहानियों की चर्चा है जिनके केन्द्र मे पशु पक्षी ही थे । जो अपनी उपस्थिति से रचना को मनोरंजक बनाने के साथ-साथ एक षिक्षा भी प्रदान करते है ।
    प्रेमचंद की पशुओ को लेकर बनाई कई सर्वप्रथम प्रकाषित कहानी 'अदीब', उर्दू पत्रिका के अप्रैल 1913 के अंक मे 'सगे-लैल' (लैला का कुत्ता) नामक शीर्षक से प्राप्त होती है । इस कहानी मे कुत्ते की महत्वपूर्ण भूमिका है । यह एक रोचक प्रेम पर आधारित कहानी है जिसमे एक प्रेमिका जिसका नाम लैला है उसके दो प्रेमी है । यह दोनो ही लैला को पाना चाहते है परन्तु कहानी का प्रमुख पात्र एक कुत्ता है जो इन दोनो के बीच मे आता है और कहानी मे कई रोचक व हाष्यास्पद घटनायें घटित होती है जो पाठको का भरपूर मनोरजंन करती है । इस कहानी मे कुत्ते का योगदान महत्वपूर्ण है । कहानी तो साधारण है परन्तु पाठको का मनोरजंन भरपूर होता है ।
    'जमाना', उर्दू मासिक पत्रिका के जनवरी 1920 के अंक मे प्रकाषित कहानी 'आत्माराम' को प्रेमचंद ने 'तोत' को केन्द्र मे रखकर कहानी की रचना की है । कहानी मे महादेव नामक सुनार वेदो ग्राम मे रहता है उसके पास एक तोता है जिसे वह हर रोज सुबह-सुबह घुमाने के लिये ले जाता है और 'सत्त गुरूदत्त षिवदत्त दाता, राम के चरण मे चित्त लागा' का बारवार उच्चारण करता । एक दिन किसी बालक ने तोते के पिजंरे को खोल दिया और तोता उड गया । काफी प्रयासों के बाद भी तोता पकड मे नही आया । महादेव रातभर तोता के इन्तजार मे बैठा रहा जहां उसे एक पेड के नीचे मोहरो से भरा कलसा प्राप्त होता है । सुबह होने पर तोता भी पिजंरे मे आकर बैठ जाता है । कहानी मे महादेव सुनार और तोता के द्वारा जीवन के यथार्थ की चर्चा की गई है । कहानी मे कुछ-कुछ आध्यात्म का पुट भी है । कहानी साधारण है जो पाठको को बांधकर रखने मे असफल रहती है ।
   'स्वत्व रक्षा' कहानी जो 'माधुरी', हिन्दी मासिक पत्रिका के जुलाई 1922 के अंक मे प्रकाषित हुई थी, मे प्रेमचंद एक घोडे को केन्द्रीय पात्र बनाकर हाष्यबोध की उत्कृष्ट कहानी की रचना करते है । कहानी मे एक घोडे द्वारा किस प्रकार अपने स्वत्व की रक्षा की जाती है वह बडे ही हास परिहास के रूप मे चित्रित किया गया है । कहानी अनुसार मीर दिलावर अली के पास एक बडी रास का कुम्मैत घोडा है यहां घोडा केवल पशु ही नही है बल्कि वह देखता है, सोचता है, विचार करता है, जिद करता है, वह स्वामी भक्त है तथा इतवार के दिन कोई भी कार्य नही करता है । इतवार का दिन उसके आराम करने का दिन होता है । एक दिन मीर साहब के मित्र मुंषी सौदागरलाल अपने पुत्र की बारात ले जाने के लिये मीर साहब से घोडा मांगकर ले जाते है परन्तु इतवार का दिन होने के कारण घोडे के द्वारा कोई कार्य करना दुष्कर था इस तरह बारातियों और घोडे को लेकर कहानी मे कई प्रकार के रोचक व हाष्यास्पद प्रसंग देखने को मिलते है । कहानी पूर्ण रूपेण हास्य व्यंग्य की चाषनी मे डूबी हुई है । जो पाठक को अंत तक बांधे रखती है ।
    'माधुरी', हिन्दी मासिक पत्रिका के अगस्त 1922 के अंक मे प्रकाषित कहानी 'अधिकार चिन्ता' मे प्रेमचंद एक बार फिर अपने प्रिय पात्र कुत्ते को नायक बनाकर प्रस्तुत करते है । कहानी मे टामी नामक कुत्ता किस प्रकार अपने अधिकार की चिन्ता करता है, खूबसूरती के साथ दर्षित किया गया है । टॉमी को प्रतिद्वन्दी की चिंता, राजा बनने की आकांक्षा, नदी को पार कर रमणीय स्थल मे प्रवेष करना आदि कई घटनायें कहानी मे रोमाचंक रूप से घटित होती है जिसका नायक टॉमी ही है ।
    उर्दू पत्रिका 'तहजीबे-निस्वां' के 5-22 अगस्त 1922 के अंक मे प्रकाषित कहानी 'नागपूजा' मे प्रेमचंद इस बार सांपो को लेकर एक चमत्कारी कहानी की रचना करते है । वैसे भी हिन्दू समाज मे सावन की पंचमी को नागो को पूजने की परम्परा है क्योकि इस दिन नागो की पूजा करने से लोगो की मनोकामनायें पूर्ण होती है । कहानी मे तिलोत्तमा नामक प्रमुख पात्रा के पति को नाग काटता है ऐसा तिलोत्तमा के साथ दो बार होता है और दोनो ही बार नाग तिलोत्तमा के पति को काटता है तथा दोनो ही बार वह विधवा हो जाती है । अंत मे तिलोत्तमा का विवाह तीसरी बार ढाका विष्वविद्यालय के अध्यापक दयाराम के साथ होना निष्चित होता है । दयाराम सांपो के विषय मे जानते थे तथा उन्होने सांपो के आचार व्यवहार के संबंध मे विषेष रीति से अध्ययन किया था । शादी पश्चात् एक दिन सांप तिलोत्तमा के रूप मे दयाराम पर हमला करता है परन्तु दयाराम तिलोत्तमा पर पिस्तौल से हमलाकर तिलोत्तमा के शरीर मे प्रवेषित सांप की आत्मा का खात्मा करता है व तिलोत्तमा को इस कष्ट से मुक्त करता है । कहानी मे भरपूर रहस्य, रोमांच व अंधविष्वास को प्राथमिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है ।
    'माधुरी', हिन्दी मासिक पत्रिका के दिसम्बर 1922 के अंक मे प्रकाषित 'पूर्व संस्कार' नामक कहानी मे बछडे से बैल बने धर्मपरायण षिवटहल नामक पात्र के द्वारा एक अद्भुत कहानी की रचना देखने को मिलती है । धर्म की राह पर चलने वाला षिवटहल नामक पात्र एक अपराध के कारण बछडे के रूप मे अपने ही भाई रामटहल के घर मे जन्म लेता है । इस बछडे के रूप मे उसका नाम 'जवाहिर' रखा जाता है । प्रेमचंद ने कहानी मे इस बछडे का वर्णन कुछ इस तरह से किया है-''बछडा श्वेत वर्ण था । उसके माथे पर एक लाल तिलक था । आंखे कजरी थी । स्वरूप का अत्यंत मनोहर और हाथ-पांव का सुडौल था । दिन भर किलोले किया करता ।'' (प्रेमचंद कहानी रचनावली, डॉ0 गोयनका, भाग-3, पृष्ठ: 121) एक महात्मा द्वारा इस बछडे के भविष्य के संबंध मे बताया जाता है कि अगर यह छठंवा वर्ष पार कर लेगा तो इसके जीवन को कोई कष्ट नही है । जवाहिर की अवस्था ढाई वर्ष की होने पर वह बछडे से बैल हो गया था । परन्तु छठंवा वर्ष आते ही जवाहिर अपना पूर्व जन्म का प्रायष्चित पूर्णकर निर्वाण पद को प्राप्त होता है । क्योकि पूर्व जन्म मे षिवटहल ने अपनी व अपने भाई की पूंजी को सद्कर्मो, धर्म के कार्यो मे लगाकर नष्ट कर दिया था इस कारण उसी परिणाम के फलस्वरूप रामटहल को हुई हानि की पूर्ति करने हेतु बछडे के रूप मे जन्म लेकर पश्चाताप पूर्ण करना था । कहानी हिन्दी धर्म को प्रदर्षित करती उत्कृष्ट रचना है तथा कहानी के अंत मे रामटहल सोचता है कि......''ऐसे धर्मात्मा प्राणी को जरा से विष्वासघात के लिये इतना कठोर दण्ड मिला तो मुझ जैसे कुकर्मी की क्या दुर्गति होगा ।'' (प्रेमचंद कहानी रचनावली, डॉ0 गोयनका, भाग-3, पृष्ठ: 125) कहानी मे पुर्नजन्म लेकर अपने पश्चाताप को पूर्ण कर निर्वाण पद प्राप्त करना व ह्दय परिवर्तन की उम्दा कहानी है ।
    'सैलानी बंदर' नामक कहानी जो माधुरी', हिन्दी मासिक पत्रिका के फरवरी 1924 के अंक मे प्रकाषित हुई थी, में प्रेमचंद इस बार एक 'बंदर' को लेकर आते है जो जीवनदास नामक मदारी और उसकी पत्नी बुधिया की आजीविका का एकमात्र सहारा है । बंदर अपनी लीलाओ के कारण पकडा जाता है । मदारी और उसकी पत्नी द्वारा दस रूपये का हरजाना न दे पाने के कारण वह बंदर को छुडा नहीं पाते है । कहानी मे विभिन्न घटनाक्रम घटित होते है । मदारी बंदर के इंतजार मे मर जाता है और उसकी पत्नी बुधिया पागल हो जाती है । लेकिन अंत मे बंदर छूटकर आता है वह बुधिया को पहचान जाता है । बुधिया को भी लगता है कि बंदर के न होने के कारण ही मेरी दषा पागलो जैसी हो गयी थी । प्रेमचंद इस कहानी का अंत इस प्रकार करते है कि-''लोग बुधिया के प्रति बंदर का यह प्रेम देखकर चकित हो जाते थे और कहते थे कि यह बंदर नही, कोई देवता है ।'' (प्रेमचंद कहानी रचनावली, डॉ0 गोयनका, भाग-3, पृष्ठ: 245) इस प्रकार यह कहानी मनुष्य और पशु के प्रेम की कहानी है ।
    'माधुरी', हिन्दी मासिक पत्रिका के मई 1924 के अंक मे प्रकाषित कहानी 'मुक्तिधन' गाय के प्रति प्रेम व अनुराग की कहानी है । कहानी मे एक गरीब मुस्लिम किसान रहमान अपनी जान से प्यारी गाय को बाजार मे बेचने जाता है परन्तु वह अपनी गाय को ज्यादा दाम मिलने के वावजूद कम दामो मे लाला दाऊदयाल को बेच देता है । क्योकि रहमान को लगता है कि लालाजी हिन्दू है और गाय की संपूर्ण सेवा करेंगे । एक मुस्लिम पात्र के द्वारा इस प्रकार की भावना एक पशु के प्रति रखना हिन्दू मुस्लिम एकता के सौहार्द को दर्षाता है जिसे प्रेमचंद ने इस कहानी मे बखूवी दर्षाया है । दाऊदयाल पैसे के लेनदेन का व्यवसाय करते थे । एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा कम दामो मे लाला जी को गाय बेचना लालाजी को  बहुत प्रभावित करता है । कहानी कई घटनाक्रम से गुजरती है । यह कहानी एक प्रकार से नई थी जो अपने कथ्य के कारण काफी लोकप्रिय रही थी । प्रेमचंद ने भी चतुराई से एक जानवर को लेकर हिन्दू मुस्लिम संबंधो के प्रेम की खूब वकालत की है । इस प्रकार यह एक आष्चर्यजनक घटना थी जो कम ही देखने को मिलती है । प्रेमचंद हिन्दू और मुस्लिम दोनो पात्रो को मनुष्यता, सद्भाव तथा विष्वास की चरम स्थिति तक ले जाते है और दोनो को बडा बनाते है ।
    गुप्तधन भाग-2, हिन्दी कहानी संग्रह, जुलाई 1962 मे संकलित कहानी Óनादान दोस्तÓ भाई बहन के आपसी प्यार व भोलेपन की कहानी है । इस कहानी मे प्रेमचंद चिडियों के संबंध मे व्याख्या करते है । कहानी मे केषव और श्यामा नामक भाई बहन के घर के कार्निष पर चिडियां ने अण्डे दिये है । दोनो बालक चिडियों के बच्चो के लिये खाने पीने की व्यवस्था करते है, व उनकी देखभाल करते है । परन्तु अंजाने मे बच्चो के भोलेपन के कारण चिडियों के अण्डे टूट जाते है जिस पर दोनो भाई बहन को गहरा दुख होता है । कहानी भाई बहन के अबोध प्यार व मासूमियत को दर्षाती है जिन्हे इस बात का अहसास नही है कि चिडियों के अण्डे छूने पर वह गन्दे हो
    जाते है और चिडियां फिर उन्हे नही सेती है । कहानी मे बालको का भोला संसार है जो रोचक है । कहानी बाल पाठको को केन्द्र मे रखकर लिखी गयी है जो रोचक व पठनीय है ।
    'माधुरी', हिन्दी मासिक पत्रिका के मई 1930 के अंक मे प्रकाषित कहानी 'पूस की रात' मुख्यत: एक किसान हल्कू और उसकी पत्नी मुन्नी की गरीबी बयां करती एक उच्चकोटि की कहानी है परन्तु इस कहानी मे 'जबरा' नामक कुत्ते का भी प्रयोग प्रेमचंद ने बखूवी किया है । जबरा हल्कू के साथ रात मे खेत की रखवाली करते वक्त उसके साथ खेलता है । हल्कू जब सर्दी अत्यधिक होने के कारण जबरा से चिपककर सोता है तो जबरा हल्कू को गर्मी का अहसास कराता है । रात मे जब खेत पर नीलगायों का झुण्ड आक्रमण करता है तो जबरा ही जोर-जोर से भूंककर हल्कू को नीलगायों द्वारा खेत पर आने को लेकर सूचित करता है व उनको भगाता है । जबरा पूर्ण रूपेण स्वामीभक्त है तथा अपने स्वामी व उसके कार्यो के लिये सदैव तत्पर रहता है । कहानी मे इस प्रकार जबरा कुत्ते की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा सकती है ।
    'हंस', हिन्दी मासिक पत्रिका के अक्टूबर 1931 के अंक मे प्रकाषित कहानी 'दो बैलों की कथा' आज भी अपने सुन्दर कथ्य के कारण हिन्दी साहित्य जगत् मे अपना सर्वोच्च स्थान रखती है । इस कहानी की गणना प्रेमचंद की श्रेष्ठ कहानियों मे की जाती है । कहानी मे हीरा मोती नामक दो बैलो को लेकर प्रेमचंद ने महत्वपूर्ण कहानी की रचना की थी । इन दोनो बैलों मे अद्भुत भाईचारा व प्रेम है इन बैलों के मालिक का साला अपने यहां बैलों को लेकर आता है परन्तु नई जगह व नये आदमी को देखकर दोनो बैल यहां से भाग जाते है । कहानी विभिन्न घटनाक्रम से होते हुये अंत मे दोनो बैल अपने मालिक के पास आकर ही दम लेते है । प्रेमचंद ने बैलों को लेकर एक मार्मिक कहानी की रचना की जो उनकी अद्भुत प्रतिभा को दर्षाता है । इस कहानी मे कई प्रभावोद्पादक दृष्य विद्यमान होते है जो पशुओ द्वारा मनुष्य को कई प्रकार के संदेष प्रदान करते है । कहानी की लोकप्रियता की वजह से इस पर हीरा मोती नामक एक फिल्म भी बनाई जा चुकी है ।
    प्रेमचंद की पशु पक्षियों पर आधारित अंतिम कहानी के रूप मे 'वारदात', उर्दू कहानी संग्रह, मार्च 1935 मे संकलित कहानी 'कोई दुख न हो तो बकरी खरीद लोÓ देखने को मिलती है । इस कहानी से पूर्व प्रेमचंद कुत्ता, बैल, गाय, चिडियां, सांप, घोडा, तोता व बंदर आदि पशु पक्षियो को लेकर अद्भुत कहानियों की रचना कर चुके थे । इस कहानी मे प्रेमचंद 'बकरी' को लेकर उपस्थित होते है । यह एक हास्य व्यंग्य की कहानी है जो पाठको का भरपूर मनोरजंन करने के साथ-साथ एक सीख भी देती है । कहानी मे कथावाचक दूध की समस्या से ग्रसित होने के कारण अपने दोस्त के साथ गाय खरीदता है परन्तु इसी दौरान कथावाचक के दोस्त का तबादला हो जाता है और दूध की समस्या एक बार फिर उपस्थित हो जाती है अंत मे कथावाचक पंडित जी के आग्रह पर एक बकरी को खरीद कर लाते है । परन्तु बकरी को चराने जैसा दुस्कर कार्य कथावाचक को ही करना पडता है । कहानी मे बकरी को लेकर कथावाचक व बकरी के बीच कई प्रकार के हास्यबोध दर्षाने वाले मनोरजंक दृष्य उपस्थित होते है जिन्हे पाठक पढते वक्त लोटपोट हुये बगैर नही रह सकता है । कहानी पूर्णत: मनोरजंक व हास्यव्यंग्य मे डूबी हुई है जिसे एक बार पाठको को अवष्य ही पढना चाहिये ।
    प्रेमचंद ने इन उपरोक्त कहानियों के अतिरिक्त बालको के लिये भी पशु पक्षियों को लेकर उच्चतम कहानियों की रचना की थी इन्हे भी देखा जाना उचित होगा । इनमे सर्वप्रथम 'हंस', हिन्दी मासिक पत्रिका के फरवरी 1936 के अंक मे 'जंगल की कहानियां' नामक संकलन के प्रकाषित होने का विज्ञापन मिलता है तथा इसका प्रथम संस्करण जनवरी 1936 मे 'सरस्वती प्रेस बनारस' से प्रकाषित हुआ था, की चर्चा की जाना आवष्यक है । इस संकलन मे बच्चो के लिये लिखी बारह कहानियां संकलित थी, जो पूर्णत: पशु पक्षियो पर ही आधारित थी । यह इनके शीर्षको को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है । इन कहानियों के नाम इस प्रकार है-'षेर और लडका', 'वनमानुष की दर्दनाक कहानी', 'दक्षिण अफ्रीका मे शेर का षिकार', 'गुब्वारे पर चीता', 'पागल हाथी', 'सांप की मनी', 'बनमानुष खानसांमा', 'मि_ू', 'पालतू भालू', 'बाघ की खाल', 'मगर का शिकार' और 'जुडंवा भाई' आदि । इन कहानियों मे पुरूष पात्रों के साथ-साथ शेर, वनमानुष, चीता, हाथी, सांप, मि_ू, भालू, बाघ, मगर आदि पशु पक्षी भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कहानियों को भरपूर रोचक बनाते है । इन कहानियों के द्वारा बालको का भरपूर मनोरजंन होने के साथ-साथ एक प्रेरणा भी प्राप्त होती है ।
    बच्चो को लेकर पशु पक्षियों पर आधारित दूसरा संकलन 'कुत्ते की कहानी' नामक शीर्षक से देखने को मिलता है जिसका 'हंस', हिन्दी मासिक पत्रिका के वर्ष नबम्वर 1935 के अंक मे प्रकाषित होने का विज्ञापन प्रकाषित हुआ था तथा इसका प्रथम संस्करण जुलाई 1936 मे 'सरस्वती प्रेस, बनारस' से प्रकाषित हुआ था । इस पुस्तक मे प्रेमचंद की एक भूमिका है जिस पर वर्ष जुलाई 1936 की तिथि मुद्रित है । इस पुस्तक मे प्रेमचंद ने एक कुत्ते को केन्द्र मे रखकर आदर्ष कहानी की रचना की है जो अपनी वफादारी से कहानी को पढनीय व रोचक बनाता है । इस प्रकार पशुओ के प्रति प्रेमचंद का प्रेम देखकर यह बखूवी अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होने इस बार एक स्वतंत्र पुस्तक कुत्ते को पात्र बनाकर तैयार कर दी थी ।
    उपरोक्त विवेचना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रेमचंद ने अपनी कहानियों मे किस प्रकार पशु पक्षियो को लेकर उच्चकोटि की कहानियों की रचना की है । उनके पुरूष पात्रों की तरह ही पशु पक्षी भी कहानियों मे बोलते हुये नजर आते है जो सब समझते है, जानते है, वे स्वामी भक्त है जो अपने स्वामी के लिये कुछ भी करने को सदैव तत्पर रहते है । इस प्रकार वे कहानियों मे जीवंत हो गये जान पडते है । पाठक प्रेमचंद के इस पशु प्रेम पर आधारित कहानियों को पढे और देखे कि वे इन कहानियों की रचना मे किस कदर सर्वश्रेष्ठ दिखाई देते है। व पशुओ को लेकर बनाये गये संसार मे वे बीस ही साबित हुये है ।

कृष्णवीर सिंह सिकरवार

आवास क्रमांक एच-3,
राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विष्वविद्यालय,
एयरपोर्ट वायपास रोड, गांधी नगर,
भोपाल-462033 (म0प्र0)
मो0 09826583363

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