काव्यगंधा’ एक सिंहावलोकन   

काव्यगंधा’ एक सिंहावलोकन  

जबसे इस वसुन्धरा पर मानव समाज अस्तित्व में आया है, तब से ही काव्य का सृजन प्रारम्भ हुआ। काव्य जीवन की सुगन्ध है और छन्द उसे गतिमान बनाता है। छन्द काव्य और जीवन में आह्लाद का संचार करता है। छन्दशास्त्र को पिंगलशास्त्र भी कहा जाता है। छन्द की परम्परा साहित्य के आदिकाल से ही प्रचलित रही है। आचार्यों ने छन्द के दो भेद किए हैं - मात्रिक छन्द और वर्णिक छन्द।  कुण्डलिया का छन्दशास्त्र में महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी काव्य में कुण्डलिया छन्द का प्रचलन दीर्घकालीन है, जिसमें गिरधर कविराय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

इसी  परम्परा में त्रिलोकसिंह ‘ठकुरेला’ की ‘काव्यगंधा’ कुण्डलिया-संग्रह को परिगणित किया जाता है। इस काव्य रचना में शाश्वत, हिन्दी, गंगा, होली, राखी, सावन आदि विविध विषयों पर कुण्डलिया लिखी गई हैं। कवि महोदय बड़े विचारक और संवेदनशील हैं। उनके जीवन की अनुभूति भी बड़ी गहन है।

शाश्वत से अभिप्राय है जीवन की निरंतरता और उसमें अनुभूति की हुई नीतिपरायणता तथा व्यवहारकुशलता। रचनाकार ने इस कुण्डलिया में उसी सत्य का प्रतिपादन किया है - सोना तपता आग में, और निखरता रूप। कभी न रुकते साहसी, छाया हो या धूप।। छाया हो या धूप, बहुत सी बाधा आयें। कभी ने बनें अधीर, नहीं मन में घबरायें। श्ठकुरेला श् कविराय ए दुखों से कभी न रोना।
निखरे सहकर कष्ट ए आदमी हो या सोना।।

मानव जीवन के चार पुरुषार्थांे में धन का भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक देश और काल में धन के बिना जीवन निर्वाह करना सम्भव नहीं है। ‘पंचतंत्र’ की तरह ‘काव्यगंधा’ में भी धन की महत्ता को दर्शाया गया है - दुविधा मंे जीवन कटे, पास न हों यदि दाम। रुपया पैसे से जुटें, घर की चीज तमाम।। घर की चीज तमाम, दाम ही सब कुछ भैया।। मेला लगे उदास, न हांे यदि पास रुपैया। श्ठकुरेला कविराय ए दाम से मिलती सुविधा। बिना दाम के ए मीत ए जगत में सौ सौ दुविधा।  लोक में यह उक्ति चरितार्थ है - बाप बड़ा न भैया। सबसे बड़ा रुपया। इसीलिए गिरिधर कवि इस सत्य को बहुत पहले ही अपनी कुण्डलिया में प्रमाणित कर चुके हैं - जब तक पैसा गांठ में, यार संग ही संग डोले। पैसा रहा न पास यार मुख से नहीं बोले।

इस संसार में जो जैसा करता है वैसा फल पाता है। शास्त्रों के सत्य को कवि ने इस प्रकार अभिव्यक्त किया है - कर्मों की गति गहन है, कौन पा सका पार। फल मिलते हर एक को, करनी के अनुसार।। करनी के अनुसार सीख गीता की इतनी। आती सब के हाथ, कमाई जिसकी जितनी। श्ठकुरेलाश् कविराय ए सीख यह सब धर्मों की।  सदा करो शुभ कर्म ए गहन गति है कर्मों की।   कवि ने माया, धर्म, मान-अपमान, सुख-दुःख, सफलता-असफलता, दुष्टता, सांसारिक बाह्य सौन्दर्य, धनवान, आचरण, खल की मित्रता, नारी पीड़ा, साहस, मौन, अन्तरावलोकन, संसार की असारता, सौम्य स्वभाव आदि विषयों पर शाश्वत शीर्षक के अन्तर्गत कुण्डलिया की रचना है।

कवि के हृदय में देशप्रेम की लहरें उमड़ रही हैं, जो इस कुण्डलिया में अभिव्यंजित हुई हैं - माटी अपने देश की, पुलकित करती गात। मन में खिलते सहल ही, खुशियों के जलजात।। खुशियों के जलजात, सदा ही लगती प्यारी। हांे निहारकर धन्य, करें सब कुछ बहिलारी। ‘ठकुरेला’ कविराय, चली आई परिपाटी। लगी स्वर्ग से श्रेष्ठ, देश की सौंधी माटी।।  इसी सत्य को महर्षि वाल्मीकि ने भगवान रामचन्द्र के मुखारविन्द से कहलवाया है - जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

हिन्दी भारत की एकता का मेरुदण्ड है। कवि ने हिन्दी शीर्षक के अन्तर्गत हिन्दी की महिमा का गुणगान किया है - हिन्दी को मिलता रहे, प्रभु ऐसा परिवेश। हिन्दीमय हो एक दिन, अपना प्यारा देश।। अपना प्यारा देश ए जगत की हो यह भाषा।
मिले मान.सम्मान ए हर तरफ अच्छा खासा।
श्ठकुरेला श् कविराय ए यही भाता है जी को ।
करे असीमित प्यार ए समूचा जग हिन्दी को ।

गंगा संसार की सबसे पवित्र नदी है और भारतीयों का महान तीर्थ है। इसीलिए गंगा को पतितपावनी गंगा मैया कहा जाता है। कवि महोदय ने गंगा की महिमा का बखान इस प्रकार किया है - केवल नदियां ही नहीं, और न जल की धार। गंगा माँ है, देवी है, है जीवन आधार। है जीवन आधार, सभी को सुख से भरती। जो भी आता पास, विविध विधि मंगल करती। ठकुरेला श् कविराय एतारता है गंगा..जल।
गंगा.अमृत .राशि ए नहीं यह नदिया केवल।

होली का पर्व फाग पर्व भी कहलाता है। यह वसन्त ऋतु का त्यौहार है और भक्त प्रहलाद की अग्नि परीक्षा का दिन है। इसे पूरे भारत में बड़े चाव से रंगों के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। कवि महोदय ने होली की बहार का चित्रण इस प्रकार किया है - होली आई, हर तरफ, बिखर गए नवरंग। रोम रोम रसमय हुआ, बजी अनोखी चंग।।

राखी का पर्व भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है। बहन अपनी रक्षा के लिए भाई को रक्षा कवच बांधती है और भाई भाव विभोर हो जाता है। कवि ने इसका मनोहारी चित्रण किया है - राखी के त्यौहार पर, बहे प्यार के रंग। भाई से बहना मिली, मन में लिये उमंग। मन में लिये उमंग ए सकल जगती हरसाई ।
राखी बांधी हाथ ए खुश हुए बहना भाई ।
श्ठकुरेला श् कविराय एरही सदियों से साखी ।
प्यार ए मान.सम्मान ए बढ़ाती आई राखी ।

सावन में मेघमालाएं वर्षा करती हैं और धरती हरियाली से ओतप्रोत हो जाती है। सावन के महीने में हरियाली तीज और श्रावणी पूर्णिमा बड़े उमंग से मनाई जाती है। कवि महोदय ने सावन के गौरव का चित्रण इस प्रकार किया है - छाई सावन की घटा, रिमझिम पड़े फुहार। गांव-गांव झूला पड़े, गूंजे मंगल चार।। गूंजे मंगलचार, खुशी तन-मन मंे छाई। गरजें खुश हो मेघ, बही मादक पुरवाई। ‘ठकुरेला’ कविराय, खुशी की वर्षा आई। हरित खेत, वन, बाग, हर तरफ सुषमा छाई।।

विविध शीर्षक के अन्तर्गत कवि महोदय ने सामयिक समस्याओं पर कुण्डलिया की रचना की है, जिसमें किसान, देशप्रेम, महंगाई, बलवान और काव्य का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। किसान को अन्नदाता कहा जाता है। वह अनेक प्रकार के कष्ट सहकर अभावों में जीवन व्यतीत करता है। कवि महोदय की किसान के प्रति बड़ी सहानुभूति है - करता है श्रम रात दिन, कृषक उगाता अन्न। रुखा-सूखा जो मिले, रहता सदा प्रसन्न।। रहता सदा प्रसन्न ए धूप ए वर्षा भी सहकर ।
सींचे फसल किसान ए ठण्ड ए पानी में रहकर ।
श्ठकुरेला श् कविराय ए उदर इस जग का भरता ।
कृषक देव जीवंत ए सभी का पालन करता ।

कवि ने महंगाई को घुड़सवार की उपमा प्रदान की है - चाबुक लेकर हाथ में, हुई तुरंग सवार। कैसे झेले आदमी, महंगाई की मार।। मँहगाई की मार ए हर तरफ आग लगाये।
स्वप्न हुए सब ख़ाक ए किधर दुखियारा जाये ।
श्ठकुरेला श् कविराय ए त्रास देती है रुक रुक ।
मँहगाई उद्दंड ए लगाये सब में चाबुक ।

कविवर त्रिलोक सिंह ‘ठकुरेला’ द्वारा विरचित ‘काव्यगंधा’ कुण्डलिया-संग्रह कथ्य और शिल्प की एक अनूठी रचना है। इसमें भावों की लहर प्रवाहित हो रही है और कला का वैभव बिखर रहा है। कवि कुण्डलिया छन्द की रचना में सिद्धहस्त हैं और आधुनिक हिन्दी काव्य में कुण्डलिया छन्द के मुकुटमणि हैं।

 

डाॅ॰ बाबूराम (डी.लिट्.)

प्रो़फेसर, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र

लेखक    ः    त्रिलोक सिंह ‘ठकुरेला’
पुस्तक    ः    काव्यगंधा (कुण्डलिया-संग्रह)
प्रकाशक    ः    नवभारत प्रकाशन, जोधपुर (राजस्थान)
संस्करण    ः    2013
मूल्य    ः    150 रुपये



No comments:

Post a Comment